शुक्रवार, 4 अप्रैल 2025

स्मृति शेष : मनोज कुमार यानि भारत

हम लोग उस पीढ़ी से आते हैं जिसने राष्ट्रवाद का पाठ किसी संघ,जनसंघ या भाजपा से नहीं सीखा ।  हमारी पीढ़ी को राष्ट्रवाद और भारतीयता का पाठ पढ़ाया था एक शर्मीले से लम्बे और खूबसूरत अभिनेता ने ,जिसका नाम मनोज कुमार था। भारत देश का बच्चा-बच्चा मनोज कुमार को जानता था,उनसे मोहब्बत करता था और उनकी फिल्मों के गीत गुनगुनाते हुए भविष्य के सपने देखता था। मनोज मुमार जन्म से मनोज कुमार नहीं थे ।  उनका नाम हरिकृष्णा गिरी गोस्वामी था। 

मनोज कुमार यदि मनोज कुमार न बनते तो कथा वाचक बनते,क्योंकि उनके पास लोगों को आकर्षित करने का हुनर था ।  मनोज कुमार उसी दिल्ली के रहने वाले थे जिस दिल्ली में ग़ालिब हुए,बहादुरशाह जफर हुए। मेरे जन्म से दो साल पहले 1957  में फिल्म फैशन से फ़िल्मी दुनिया में कदम रखने वाले मनोज कुमार 1967  में उपकार बनाकर हर भारतीय के दिल पर छा गए ।  ' मेरे देश की धरती सोना उगले -उगले हीरा मोती ' हर भारतीय की जुबान पर था। वे आदर्श किसान थे उस फिल्म में। संघर्ष उनकी पहचान था। जो आज आधी सदी के बाद भी अमित है। 

भारत कुमार यानी मनोज कुमार ने भरी -पूरी जिंदगी पायी  ।

 वे 87  साल के होकर चुपचाप बिना किसी विवाद के इहलोक से विद्दा हुए हैं। उनके ऊपर कोई ऐसा दाग-धब्बा नहीं है की लोग मनोज कुमार से घृणा करे ।  मनोज कुमार केवल और केवल मोहब्बत के लायक थे। मनोज कुमार का फ़िल्मी सफरधीमी गति के समाचारों जैसा था ।  वे साल में एक फिल्म बना लें तो बहुत है। उन्हें सुपर स्टार या जुबली कुमार बनने की जल्दी शायद कभी नहीं रही। वे खरामा-खरामा अपना काम करते थ।। उनके काम करने के तरिके से आप शायद सहमत न भी हों ,लेकिन ये उनका अपना अंदाज था।  

 मनोज कुमार ने 1957फैशन,1958  सहारा और पंचायत में काम किया लेकिन पहचाने नहीं गए ।  1960  में हनीमून भी उनके काम नहीं यी लेकिन 1961  में रेशमी रूमाल और कांच की गुड़िया के जरिये वे चर्चा में आये। इसी साल सुहाग सिन्दूर ने उन्हें पहचान दिलाई। 1962  में शादी ,नकली नबाब ,डाक्टर विद्या ,बनारसी ठग, अपना बना के देखो और मान बेटा के साथ ही हरियाली और रास्ता ने मनोज कुमार की सफलता का रास्ता खोला ।  उन्हें कामयाब बनाने में गीत -संगीत की अपनी भूमिका थी। मुझे याद है की 1963  में मनोज कुमार गृहस्थी में नजर आये ,इसी साल उन्होंने घर बसा के देखो में काम किया। 1964  में फूलों की सेज और अपने हुएपराये ने दर्शकों को रुलाया भी और हसाया भी। लेकिन 1964  में ही आयी एक मिस्त्री फिल्म 'वो कौन थी ' ने उन्हें हीरो के रूप में स्थापित कर दिया। गुमनाम ने उन्हें नया मुकाम दिया। 1965  में बेदाग  और 1965  में ही शहीद ने उन्हें जो मुकाम दिया उसे वे ताउम्र भुनाते रहे। 

 मनोज कुमार ने हर विषय पर फ़िल्में लीन और अभिनय किया ।  शहीद के बाद पूनम की रात, से कहीं ज्यादा ' हिमालय की गोद में फिल्म ने मनोज कुमार को चमकाया ।  इस फिल्म का गीत ' चाँद सी मेहबूबा हो मेरी कब ऐसा मायने सोचा था। आज भी ज़िंदा है। सावन की घटा,पिकनिक,और दो बदन को कौन भूल सकता है ।  हम लोगों ने उस समय दो बदन स्कूल से गोत लगाकार देखीं थी । पत्थर के सनम  ने मनोज के अभिनय का लोहा मनवा लिया । उपकार तो ब्लाक बस्टर और मील का पत्थर फिल्म साबित हुई। मनोज कुमार की फिल्म  अनीता और आदमी जिसने भी देखी होगी वो इसे शायद ही कभी भुला पा।  जब मैं कक्षा 8  का छात्र था तब मनोजकुमार की फिल्म नीलकमल को देखने लवकुशनगर [ लौंडी] से महोबा तक साइकल से गया था। उनकी फिल्म साजन,पहचान,यादगार  के बाद पूरब और पश्चिम ने मनोज कुमार को जो छवि दी वो आजन्म उनके सतह चिपकी रही। उन्होंने मेरा नाम जोकर में भी काम किया। 

आम आदमी के सरोकारों को लेकर बनी फिल्मों में काम करने के लिए जाने जाने वाले मनोज कुमार की फिल्म शोर ने जो शोर मचाया उसकी प्रतिध्वनि आज भी सुनाई देती ह।  बाकी कुछ बचा तो महगाई मार गयी ,पानी रे पानी को कौन भूल सकता है ?  बेईमान,रोटी कपड़ा और मकान तथा सन्यासी को हमारी पीढ़ी कभी नहीं भुला सकती। दस नंबरी ,अमानत,जैसी फ़िल्में बनाने वाले मनोज कुमार ने शिरडी के साइन बाबा जैसी फ़िल्में बनाने का काम भी किया। वे जाट पंजाबी भी बना सके,लेकिन क्रांति और कलियुग की रामायण तथा संतोष  जैसी फ़िल्में बनाने का दुस्साहस भी मनोज कुमार जैसे हीरो ही कर सकते थे। 

मुझे याद आता है कि मनोज कुमार ने 1995 की फिल्म मैदान-ए-जंग में काम करने  के बाद उन्होंने अभिनय छोड़ दिया । उन्होंने अपने बेटे कुणाल गोस्वामी को 1999 की फिल्म जय हिंद में निर्देशित किया , जो देशभक्ति की थीम पर आधारित थी। यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर असफल रही और कुमार ने जिस आखिरी फिल्म में काम किया, वह थी।

चार दशक से  अधिक के फ़िल्मी योगदान  के लिए उन्हें 1999 में फिल्मफेयर लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड से सम्मानित किया गया। 

मनोज कुमार को जितने सम्मान मिले उतने ज्यादा नहीं हैं  लेकिन वे इन पुरस्कारों के पीछे भगे  नही।  उन्होंने किसी का पिछलग्गू बनना पसंद नहीं किया। वे किस का माउथपीस नहीं बने । बने भी तो आम आदमी के प्रवक्ता। लेकिन दूसरों की तरह मनोज कुमार भी आखरी वक्त में हिन्दू बन गए।  मनोज कुमार ने भी रिटायरमेंट के  बाद राजनीति में प्रवेश करने का फैसला किया।मुझे याद है कि  2004 के आम चुनाव से पहले, मनोज कुमार  आधिकारिक तौर पर भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए। लेकिन ये उनकी गलती थी  या नहीं ये वे जाने ।  मैं तो उनका सम्मान एक भावुक,संवेदनशील ,शांत अभिनेता के रूप में याद करता हूँ। विनम्र श्रृद्धांजलि। 

@ राकेश अचल

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