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शुक्रवार, 28 मार्च 2025

मुंह में राम, बगल में छुरियां आखिर क्यों ?

 
मेरे तमाम पाठक मश्विरा देते हैं कि मुझे अब भाजपा और मोदी जी को बख्श देना चाहिए ,क्योंकि ये दोनों मुझे बीमार कर सकते है।  ऐसे मित्रों को मैं अक्सर कहता हूँ कि  भाजपा और मोदी जी ने मेरी भैंस नहीं खोली,इसलिए उनसे मेरी कोई अदावत नहीं है ।  मैं इन दोनों के खिलाफ नहीं बल्कि सत्ता प्रतिष्ठान को केंद्र में रखकर लिखता हूँ ।  कल यहां कोई और होगा ,आज यहां भाजपा और मोदी जी हैं। आज भी मैं भाजपा और मोदी जी को मश्विरा देने जा रहा हूँ कि  -देश सेवा करना है तो अब ' मुंह में राम और बगल में छुरियां रखना बंद कर देना चाहिए। 

मैं न मुसलमान हूँ और न रोजा रखता हूँ ,लेकिन मैं भाजपा के इस ऐलान से खुश हुआ था कि  आने वाली ईद को मुल्क के 32  लाख मुसलमानों को ,गरीब मुसलमानों को सौगात-ऐ- मोदी बांटी जाएगी ,लेकिन मेरी ख़ुशी केवल एक दिन टिकी और उस समय काफूर हो गयी जब भाजपा शासित अनेक  राज्य सरकारों ने मुसलमानों की खुशियां  छीनने वाले फैसले कर डाले। अब या तो राज्य सरकारें माननीय मोदीजी को नीचा दिखाना चाहतीं हैं या फिर मोदी जी के इशारे पर ही मुसलमानों को दुखी करने वाले फैसले कर रहीं हैं।  

खबर हरियाणा से आयी है कि  हरियाणा सरकार ने मुसलमानों को ईद पर मिलने वाली सरकारी छुट्टी रद्द कर दी है। तर्क ये है कि   ईद की छुट्टी को गजेटेड हॉलीडे के बजाय रेस्ट्रिक्टेड हॉलीडे  किया गया है।  सरकारी अधिसूचना के मुताबिक  सप्ताहांत  होने के चलते शनिवार और रविवार (29 और 30 मार्च) को छुट्टी होगी. इसी बीच 31 मार्च (सोमवार) को फाइनेंशियल ईयर का कलोजिंग डे है. इसलिए सरकारी की ओर से यह फैसला लिया गया है ।  भारतीय रिजर्ब बैंक ये कदम उठती है तो समझ आता है ,उसने ये कदम उठाया भी है। भारतीय रिजर्व बैंक  ने अपने सभी बैंक को 31 मार्च को काम करने और सभी सरकारी लेन-देन पूरा करने के निर्देश दिए हैं. यानी ईद की छुट्टी सस्पेंड कर दी गई है और सभी बैंकिंग सुविधाएं जारी रहेंगी लेकिन हरियाणा को छोड़ किसी और सूबे ने ये अक्लमंदी नहीं दिखाई। 

मोदी जी कितने उदार हैं लेकिन उनकी पार्टी की सरकारें उतनी ही कठोर हो रही है।  मोदी जी के चिर प्रतिद्वंदी माने जाने वाले उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार और नौकरशाही हरियाणा से भी आगे निकल गयी। मेरठ में पुलिस प्रशासन ने ईद की नमाज को लेकर सख्त आदेश जारी करते हुए सड़कों पर नमाज पढ़ने पर रोक लगा दी है। इस आदेश पर अब प्रदेश में सियासत हो रही है। एनडीए की सहयोगी और केंद्र सरकार में मंत्री जयंत चौधरी ने मेरठ पुलिस के इस फैसले का विरोध किया है और उसकी तुलना ऑरवेलियन 1984 की पुलिसिंग से की है। उन्होंने अपने ट्विटर हैंडल पर ये पोस्ट किया है। संभल में पीस कमेटी की बैठक बुलाकर सबको नसीहत दी गई है कि कोई मस्जिद के अलावा कहीं नमाज़ पढ़ता हुआ दिखाई दिया, तो सख्त एक्शन होगा। 

हरियाणा और उत्तर प्रदेश से भी एक कदम आगे 27  साल बाद दिल्ली में आयी भाजपा की सरकार नवरात्रि पर दिल्ली  में मांस की दुकानें बंद करने पर आमादा है। दिल्ली में मीट और मछली की बिक्री को लेकर सरकार ने बड़ा फैसला किया है। दिल्ली में गैरकानूनी रूप से मीट, मछली बेचने पर रोक लगाई गई है। दिल्ली सरकार में मंत्री प्रवेश वर्मा ने इस संबंध में अधिकारियों को निर्देश दिए हैं। इस संबंध में प्रवेश वर्मा ने कहा कि राजधानी में अधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं कि वह गैरकानूनी मीट, मछली बेचने वाली यूनिट को खत्म करें। मंत्री प्रवेश वर्मा ने साफ कहा कि कोई भी व्यक्ति गैर-कानूनी रूप से मीट और मछली नहीं बेचना चाहिए।अब इस फैसले से कौन खुश होगा और कौन नहीं ये सब बताने की जरूरत नहीं है। यानि इस बार भले ही मोदी जी की तरफ से गरीब मुसलमानों को सौगात बांटने का ऐलान किया गया हो किन्तु भाजपा शासित सरकारों ने तमाम तरह की पाबंदियां लगाकर ईद का मजा तो पहले से ही किरकिरा कर दिया है। 

इस मुल्क में सड़क पर कांवड़ यात्राएं वर्षों से निकल रहीं है।  धार्मिक जुलूस निकाले  जाते है ।  हर धर्म के लोग जुलूस निकलते हैं लेकिन परेशानी अलविदा की नमाज से है। अलविदा की नमाज से क़ानून और व्यवस्था की स्थिति खराब होती है। अरे मिया !  सड़क पर नमाज कोई पूरे दिन  तो नहीं होती ! कुछ देर के लिए उसी तरह ट्रेफिक को मोड़ा जा सकता है जिस तरह मंत्रियों की सभाओं के लिए मोड़ा जाता है ,लेकिन ये कसरत कौन करे? क्यों करे ? मुसलमान इस मुल्क के नागरिक थोड़े ही हैं।  सारी पाबंदियां उन्हीं के लिए हैं। बहुसंख्यक महाराष्ट्र के अहिल्यनगर में ख्वाजा चिश्ती की दरगाह पर बवाल काट सकते हैं,वहां भगवा फहरा सकते हैं।  शायद यही  गजबा -ऐ-हिन्द का जबाब भगवा -ऐ- हिन्द है और वो भी सरकार की तरफ से। गनीमत है कि  ईद के चाँद पर हमारी भाजपा सरकार का नियंत्रण नहीं है अन्यथा ये भी मुमकिन था की चाँद को या तो निकलने ही नहीं दिया जाता या फिर उन मोहल्लों में चादरें तान दी जातीं हैं जहाँ चाँद देखना एक रिवायत है। 

 @ राकेश अचल

गुरुवार, 27 मार्च 2025

अब राणा सांगा को लेकर जंग का आगाज

हमारा मुल्क बिना  जंग के रह नहीं सकता ।  हम बमुश्किल औरंगजेब से फ़ारिग हुए थे कि गुरु रामजीलाल सुमन ने राणा सांगा को मैदाने जंग में ला खड़ा किया। राणा सांगा की और से अब ये लड़ाई करणी सेना लड़ रही है और सुमन की और से अखिलेश यादव की यादवी सेना।  हम आम जनता मूकदर्शक  बने इस  जंग को देख रहे हैं।  हम न इस जंग का हिस्सा बन सकते हैं और न हमारी  इस जंग का हिस्सा बनने में कोई दिलचस्पी है। हाँ हमारी दिलचस्पी इस बात में जरूर है कि  उत्तर प्रदेश जैसे बड़े सूबे की उत्तरदायी सरकार कैसे एक निर्वाचित संसद को सुरक्षा प्रदान नहीं कर पाती ।
राणा सांगा के बारे में जानने से पहले आप रामजी लाल सुमन के बारे में जान लीजिये। कोई 48 साल का संसदीय अनुभव रखने वाले रामजीलाल सुमन चंद्रशेखर से लेकर मुलायम सिंह जैसे कद्दावर नेताओं के भरोसेमंद और विश्वसनीय साथ ही रहे हैं।   25 जुलाई 1950 को हाथरस जनपद के बहदोई गांव में  जन्में रामजीलाल सुमन  की प्राथमिक शिक्षा गांव में हुई. उनकी माध्यमिक शिक्षा हाथरस में और उच्च शिक्षा आगरा कॉलेज में हुई।  समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव रामजीलाल सुमन पहली बार 1977 में लोकसभा पहुंचे थे। यानि हमारे सुमन जी हमारे प्रधानमंत्री जी की उम्र के हैं और उनसे पुराने सांसद है।  उन्हें इतिहास का ज्ञान भी कम नहीं है।
आपको बता दें कि  रामजीलाल सुमन ने राज्यसभा में कहा था, अगर मुसलमानों को बाबर का वंशज कहा जाता है, तो हिंदू गद्दार राणा सांगा के वंशज होने चाहिए। हम बाबर की आलोचना करते हैं, लेकिन राणा सांगा की आलोचना क्‍यों नहीं करते ? सुमन ने सवाल किया था,जंगे ऐलान नहीं।  कोई राजपूत ,कोई हिन्दू हृदय सम्राट सुमन कि सवाल का शास्त्रोक्त जबाब देकर मामला शांत कर सकता था ,लेकिन दुर्भाग्य की जबाब देने कि लिए पढ़े-लिखे लोगों का टोटा है।  सपा अध्‍यक्ष अखिलेश यादव ने भी सुमन के इस बयान का समर्थन किया है। इसके बाद विवाद शुरू हो गया है। सुमन ने यह भी कहा था कि आखिर बाबर को भारत कौन लाया। यह राणा सांगा ही थे जिन्‍होंने बाबर को इब्राहिम लोदी को हराने के लिए आमंत्रित किया था।अब गवाही कि लिए न इब्राहिम लोदी आ सकते हैं और न राणा सांग।  बाबर को भी समन नहीं किया जा सकता। भरोसा इतिहास की किताबों पर ही करना होगा।
रामजीलाल सुमन के बयान के बाद करणी सेना भड़क गयी।  ये सेना राणा सांगा के समय में थी या नहीं ,मै नहीं जानता ,लेकिन मुझे पता है कि  ये वो सेना है जो एक फिल्म का विरोध करने के लिए सड़कों पर पहली  बार उतरी थी ।  ये सेना भारतीय सेना की कोई ब्रिगेड है या नहीं  ये भी मैं नहीं जानता। हमारे देश में भारतीय सेना के अलावा भी अनेक सेनाएं हैं।  इन सेनाओं पर कोई लगाम नहीं लगाता ।  एक जमाने में बिहार में ऐसी निजी सेनाओं का बहुत बोलबाला था ,लेकिन बाद में सबकी बोलती बंद होगयी। उत्तरप्रदेश में करणी सेना की बोलती बंद नहीं हुई क्योंकि सूबे की सरकार ने इस सेना को तोड़फोड़ करने के लिए अधिमान्य कर रखा है अन्यथा किसी भी निजी सेना की क्या मजाल कि  वो 75  साल के एक प्रतिष्ठित नेता के घर को घेर कर वहां तोड़फोड़ करे और पुलिस को भी घायल कर दे ?
लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शन का अधिकार सभी को है। करणी सेना को भी ,लेकिन विरोध प्रदर्शन के तरीके भी हैं ।  सुमन ने यदि कुछ गलत कहा है तो उनकी मुखलफ़्त राज्य सभा  में की जाये। क्या करनी सेना की और से एक भी राजपूत राज्य सभा में नहीं है जो खड़े होकर सुमन के बयान का विरोध कर सके ? करणी सेना को राजपूती अस्मिता की इतनी ही फ़िक्र है तो उसे पुलिस थाने जाना चाहिए अदालत जाना चाहिए ,लेकिन इतना ठठकर्म कौन करे। सड़क पर आकर जंग लड़ना ज्यादा आसान है।  कुणाल कामरा के खिलाफ महाराष्ट्र में इसी तर्ज पर शिवसेना [एकनाथ शिंदे समूह ] ने भी लड़ाई लड़ी।  क़ानून हाथ में लेने में उतनी मशक्क्त नहीं करना पड़ती जितनी की कानूनी रूप से जंग लड़ने में करना पड़ती है। शिंदे समर्थकों को कुणाल कि मुंह से ' गद्दार ' शब्द बुरा लगा लेकिन पूर्व मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के मुंह से नहीं। शिंदे का  कोई  समर्थक उद्धव के घर तोड़फोड़ करने नहीं गया। ठीक इसी तरह रामजीलाल सुमन के मुंह से गद्दार सशब्द सुनकर करनी सेना की आत्मा घायल हो गयी।
चूंकि हमारा इस जंग से सीधे कोई सरोकार नहीं है इसलिए हम तमाशबीन की हैसियत में है।  तमाशबीन या तो तालियां बजाते हैं या फिर सीटियाँ। तमाशा समाप्त होने पर पान चबाते या गुटका खाते हुए अपने घरों को लौट जाते हैं।  राणा सांगा बनाम रामनीलाल सुमन की जंग में भी यही सब होता दिखाई दे रहा है।  सत्ता पोषित हिंसा के हम सब मूक दर्शक हैं। हमारा क़ानून भारहीन है ,उसे कोई भी अपने हाथ में ले सकता है हालांकि हमारी बहादुर पुलिस क़ानून को बचाने के लिए करणी सेना से पिट भी लेती है।  पुलिस  बनाई ही गयी है पिटने-पीटने के लिए। जान जैसा मौक़ा होता है ,तब तैसा हो जाता है।
राणा सांगा हमारी राजयसभा में उसी तरह आये जैसे औरंगजेब और उनकी कब्र आयी थी।  मरे हुए लोगों को संसद में आने -जाने से कोई रोक नहीं सकता।  ये बिना चुनाव लड़े संसद में आ-जा सकते हैं और हंगामा खड़ा कर वापस भी लौट सकते हैं।राणा सांगा को भी हमने उसी तरह नहीं देखा जिस तरह की औरंगजेब को नहीं देखा था।  राणा की बहादुरी के किस्से हमने भी पढ़े हैं,सुने हैं लेकिन देखे नहीं हैं। सुमन ने भी नहीं देखे होंगे और करणी सेना ने भी। सबने उनके बारे में वैसे ही पढ़ा और सुना होगा जैसे की दूसरे नायकों,खलनायकों,अधिनायकों के बारे में पढ़ा  और सुना जाता है।
अतीत के किरदारों को लेकर हमारी भावनाएं आग की तरह क्यों भडक़तीं हैं ,इसके बारे में शोध होना चाहिए।  हमारी भावनाएं छुईमुई   हैं जो हाल कुम्हला जातीं हैं,आहत हो जातीं है।  मजे की बात ये है कि आहत भावनाओं का कोई भेषजीय उपचार नहीं है ।  आहत भावनाएं केवल खून-खराबा और अराजकता पैदाकर अपना इलाज खुद करना चाहती हैं। रामजीलाल सुमन पर हमला कर, करनी सेना ने हिन्दू-मुसलमान नहीं बल्कि हिन्दू -बनाम हिन्दू संघर्ष को न्यौता दिया है ।  एक तरफ करणी सेना के हिन्दू हैं   तो दूसरी तरफ वे हिन्दू हैं  जो अनुसूचित जाति के कहे और माने जाते हैं। हमारी सरकार भी यही चाहती है  कि  लोग इसी तरह से अपनी धार्मिक,जातीय भावनाओं को आहत करते-करते रहें और लड़ते-लड़ाते रहें। लेकिन मैं इसके खिलाफ हूँ ,क्योंकि इस तरह की गतिविधियों से हमारे विश्वगुरु  बनने के अभियान में खलल पड़ता है।
काश कि  इस तरह के विवादों में पीड़ित पक्ष   के रूप में खुद औरंगजेब  या राणा सांगा की आत्माएं प्रकट होकर जंग लड़तीं। मुमकिन है कि  वे लड़ती ही नहीं क्योंकि वे दोनों तो अब एक ही जगह पर पहुँच चुकी है।  मरी हुई आत्माएं कभी ,किसी से लड़ने नहीं आतीं ठीक वैसे ही जैसे नेहरू और इंदिरा भाजपा और माननीय मोदी जी से लड़ने नहीं आते। इसलिए हे भारतीय नागरिको ,जागो ! और ,बिना बात के बवाल मत काटो ।  बवाल काटना भी है तो उन मुद्दों पर काटो जो आपके भविष्य से जुड़े हुए हैं। वर्तमान से जुड़े हैं। अतीत के लिए वर्तमान से लड़ना कतई बुद्धिमत्ता नहीं है।
@ राकेश अचल  

बुधवार, 26 मार्च 2025

गुडी पडवा कालयुक्तनाम नवसंवत्सर 2082 : 30 मार्च को मनाया जाएगा

ग्वालियर 26 मार्च । गुडी पडवा कालयुक्तनाम नवसंवत्सर 2082 , 30 मार्च 2025 को मनाया जाएगा। इससे पूर्व सांस्कृतिक कार्यक्रम शहर के विभिन्न स्थानों पर आयोजित किए जा रहे हैं। आज रॉक्सी पुल पर विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए गए। 

गुडी पडवा कालयुक्तनाम नवसंवत्सर 2082 30 मार्च को मनाया जाएगा। इससे सांस्कृतिक कार्यक्रम शहर के विभिन्न स्थानों पर प्रतिदिन सायं 6 बजे से आयोजित किए जा रहे हैं। जिसमें 27 मार्च को छत्री मंडी, 28 मार्च को जीवाजी चॉक बाडा पर विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रम लोकगीत, भरत नाट्यम, बालिकाओं द्वारा नृत्य, काव्य गोष्ठी, शास्त्रीय संगीत आदि आयोजित किए जा रहे हैं। 

इसके साथ ही 29 मार्च को पूर्व संध्या वर्तमान पिंगलनाम संवत्सर 2081 विदाई समारोह सायं 6ः30 बजे से जलविहार स्थित मनाया जाएगा। इस अवसर पर ध्येय गीत, काव्य गोष्ठी, शास्त्रीय वादन, संगीत सरिता नवराग मंजरी, शास्त्रीय नृत्य, ओडिसी नृत्य आदि कार्यक्रम आयोजित किए जाएगें। 

मुख्य कार्यक्रम गुडीपडवा कालयुक्तनाम नवसंवत्सर 2082 स्वागत महोत्सव 30 मार्च को जलविहार पर विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रम कर मनाया जाएगा। 

'गजवा -ए- हिन्द' बनाम 'सौगात -ए - मोदी '

आज मै खुले दिल से भाजपा के दुस्साहस को सलाम करता हूँ ।  आप कहेंगे कि सलाम क्यों,प्रणाम क्यों नहीं ? तो भाई केवल भाषा का फर्क है,भाव का नहीं। भाजपा एक तरफ हाल के अनेक चुनावों में देश के मुसलमानों  को मंगलसूत्रों का लुटेरा कह चुकी है। उनके खिलाफ ' बंटोगे   तो कटोगे ' का नारा लगा चुकी है ।  मुसलमानों के खिलाफ आधे हिंदुस्तान में भारतीय न्याय संहिता के बजाय ' बुलडोजर संहिता ' का खुले आम इस्तेमाल कर चुकी है ,बावजूद इसके आने वाली ईद पर भाजपा मुसलमानों के बीच ' सौगात-ए-मोदी ' लेकर पहुँचने वाली है।ये सौगात मसलमानों के ' गजवा ए हिन्द ' कि मुकाबले में है।  ईद पर 32 लाख गरीब मुसलमानों को 'सौगात-ए-मोदी' किट  में सेवइयां, खजूर, ड्राई फ्रूट्स, बेसन, घी-डालडा और महिलाओं के लिए सूट के कपड़े होंगे। 

सब जानते हैं कि  भाजपा और आरएसएस मुसलमान विहीन ,कांग्रेस विहीन भारत चाहते हैं  ,लेकिन वे सारा कस-बल लगाकर भी इस लक्ष्य को हासिल नहीं कर पाए। इन दोनों संस्थाओं ने जिन्दा मुसलमानों के साथ ही मर चुके औरंगजेब   की कब्र तक पर हमले कर लिए लेकिन बात बनी नही।  संघ के इंद्रेश  कुमार मुस्लिम राष्ट्रिय मंच बनाकर भी देश के मुसलमानों को भाजपा के पक्ष में नहीं कर पाए किन्तु भाजपा ने हार नहीं मानी। भाजपा मुसलमानों को संसद में ' कटुआ' कहने के बाद भी सोचती है कि  गरीब   मुसलमान सेवइयां, खजूर, ड्राई फ्रूट्स, बेसन, घी-डालडा और महिलाओं के लिए सूट के कपड़े के लालच में आकर भाजपा का वोट बैंक बन जाएगा। उस भाजपा के साथ खड़ा हो जायेगा जो मुसलमानों को न संसद में जाने दे रही है और न विधानसभाओं में। 

भाजपा के दुस्साहस से देश की दीगर सियासी पार्टियों क सीखना चाहिए। भाजपा ने आज 25  मार्च से मोदी की सौगत वाली किट बाँटने का आगाज कर दिया है। भाजपा का कहना है कि यह योजना न केवल सहायता प्रदान करेगी, बल्कि मुस्लिम समुदाय को ‘चंद दलालों और ठेकेदारों’ के प्रभाव से बाहर निकालने में भी मदद करेगी।इसकी शुरुआत नई दिल्ली के गालिब अकादमी से हो रही है . इसके तहत हर एक भाजपा कार्यकर्ता 100 लोगों से संपर्क करेगा. भाजपा का दावा है कि यह कदम सामाजिक समावेश और गरीबी उन्मूलन की दिशा में एक बड़ा प्रयास है. इस पहल को बिहार सहित कई राज्यों में लागू किया जाएगा, जहां भाजपा की मजबूत उपस्थिति है। 

 सौगात ए मोदी अभियान भारतीय जनता पार्टी द्वारा शुरू किया गया एक अभियान है। इसका उद्देश्य है मुस्लिम समुदाय के बीच कल्याणकारी योजनाओं को बढ़ावा देना और भाजपा और एनडीए के लिए राजनीतिक समर्थन जुटाना है।  यह अभियान खास इसलिए भी है क्योंकि यह रमजान और ईद जैसे अवसरों पर केंद्रित है। भाजपा जहाँ एक और सम्भल और ज्ञानवापी जैसी मस्जिदों को खोदने पर आमादा हैवहीं दूसरी और भाजपा ने 3 हजार मस्जिदों के साथ सहयोग करने की योजना बनाई है। आप इसे केंद्र सरकार का  समावेशी  निर्णय भी कह सकते हैं और राजनीति का हिस्सा हिस्सा भी कह सकते हैं  हैं। 

दुनिया और भारत का मुसलमान जानता है कि  भाजपा और भाजपा के प्रचारक से प्रधानमंत्री बने मोदी जी मुसलमानों की टोपी से चिढ़ते है।  प्रधानमंत्री आवास पर होने वाली इफ्तार पार्टियों को वे बंद करा चुके हैं ,लेकिन अचानक बिहार जीतने के लिए अब  भाजपा और संघ दोनों ने अपना रंग बदल लिया है। बिहार में अचानक  पटना में अलग-अलग राजनैतिक दलों द्वारा इफ्तार का आयोजन किया गया । भाजपा के सहयोगी  चिराग पासवान द्वारा भी इफ्तार पार्टी का आयोजन किया गया ,लेकिन कई मुस्लिम नेताओं ने इससे  दूरी बना रखी। चिराग पासवान कहते घूम रहे हैं  कि केंद्र सरकार मुसलमानों के लिए लगातार काम कर रही है लेकिन उस हिसाब से मुस्लिम समुदाय के लोगों का वोट एनडीए को नहीं मिल रहा है। साथ ही उन्होंने कहा कि मुसलमानों का इस्तेमाल केवल वोट बैंक की तरह किया गया है। 

सौगात-ए-मोदी पर प्रतिक्रियाएं आने लगीं हैं।  कोई इसे मुसलमानों के साथ छल बता रहा है तो कोई इसे चुनावी दांव बता रहा है. अखिलेश यादव समेत विपक्ष के कई नेता भाजपा की इस योजना पर बिफरे हुए हैं. तृमूकां  सांसद शत्रुघ्न सिन्हा ने तो इस योजना को मुसलमानों के साथ मजाक बताया है। बीजेपी ने सौगात-ए-मोदी की शुरुआत दिल्ली से की है, मगर इसकी सबसे ज्यादा चर्चा बिहार में है।  क्योंकि बिहार में इसी साल विधानसभा के चुनाव होने हैं। विपक्ष आरोप लगा रहा है कि मुस्लिम मतदाताओं को लुभाने के लिए भाजपा  ने ये दांव चला है। हालांकि, विपक्ष के नेता ये भी कहते हैं कि ऐसी सौगातों से भाजपा  को बिहार में कोई फायदा नहीं मिलने वाला. जबकि भाजपा का कहना है कि गरीब अल्पसंख्यक भी खुशी से अपना पर्व मनाएं इस लिए ये योजना चलाई गई है। 

आप भाजपा से और अपने आपसे सवाल कर सकते हैं कि  भाजपा को अचानक गरीब मुसलमानों की चिंता क्यों सताने लगी ? भाजपा मुसलमानों को आतंकित कर देख चुकी है लेकिन उसे लगता है कि  बात अभी बनी नहीं है इसलिए अब मुसलमानों की गरीबी का लाभ उठाने के लिए उन्हें मोदी जी की और से सौगात बांटी जा रही है।  ये सौगात मोदी जी के वेतन से नहीं जा रही ।  भाजपा के चंदे से जुटाए करोड़ों रुपयों से नहीं दी जा रही ।  ये सौगात सरकारी पैसे से दी जा रही है। उस सरकारी पैसे से जो देश के आम करदाताओं का पैसा है। यानि ये  सौगात भी एक तरह का फ्रीबीज है। जिस देश में 80  करोड़ से ज्यादा लोग दो वक्त की रोटी के लिए सरकार के मोहताज हैं उस मुल्क में 32  लाख गरीब मुसलमानों को रिझाना कोई कठिन काम नहीं है। 

भाजपा का ये कदम हालाँकि साफतौर पर सियासी है लेकिन मैं इसकी कामयाबी की कामना करता हूँ। कम से कम गरीब मुसलमानों को कुछ तो मिलेगा।  किन्तु मुझे इस बात पर संदेह बह है कि  मुल्क का गरीब मुसलमान ईद जैसे पाक त्यौहार पर कोई सियासी सौगात कबूल कर अपने ईमान ,इकबाल का सौदा करेगा ? इस देश के मुसलमानों के मन में भाजपा को लेकर जो संदेह हैं वे मोदी जी की छह सौ रुपल्ली की सौगात से दूर होने वाले नहीं हैं।  फिर भी कोशिश तो एक आशा जैसी है ही। कांग्रेस समेत दूसरे तमाम दलों के पास मोदी की इस सौगात के जबाब में कोई और महंगी सौगात है क्या ? भारत में मुस्लिम आबादी अभी 20  करोड़ है । जाहिर है की भाजपा ने मोदी जी की  सौगात पूरे देश के मुसलमानों के लिए तैयार नहीं की है।  ये सिर्फ ३२ लाख मुसलमानन के लिए है जो बिहार में रहते हैं।  

@ राकेश अचल

मंगलवार, 25 मार्च 2025

मरे हुए लोग

 


मरे हुए लोगों से डरते हैं

जीवित होकर भी मरे लोग

मरे हुए लोग

मरे हुए लोगों के लिए होते हैं खतरा

जिंदा लोगों का 

मरे हुए लोग, कुछ नहीं बिगाड सकते.

मरा हुआ कोई औरंगजेब हो या बाबर

अकबर हो या शाहजहां

कुछ नहीं बिगाड सकते किसी का

मरे हुए लोग कब्र में हों या

उन्हे जला दिया गया हो

मरे हुए लोग चाहे समुद्र में फेंक दिए जाएं 

कुछ नहीं बिगाड सकते किसी का

मरे हुए लोगों के नाम पर 

हौवा खडा करने वाले लोग भी

मरे लोग ही हैं.

मरे लोगों को पसंद होते हैं 

मरे हुए लोग,

मरे हुए लोगों कब्रें 

जो दूसरों की कब्र खोदते हैं

या दूसरों के लिए कब्र खोदते हैं

वे खुद सुपुर्दे खाक कर दिए जाते हैं

ऐसे लोग औरंगजेब हों या 

शेर शाह सूरी.

@ राकेश अचल

होली-रंगपंचमी जैसे पर्व हमें बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश देते हैं : केंद्रीय मंत्री सिंधिया

 ग्वालियर  ।  होली दिल से दिल मिलने का त्यौहार है। होली पर रंगों में सभी के चेहरे और धर्म छुप जाते हैं। यह बात केन्द्रीय संचार एवं पूर्वोत्तर क्षेत्र विकास मंत्री श्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने सोमवार को ग्वालियर-15 विधानसभा क्षेत्र में ऊर्जा मंत्री श्री प्रद्युम्न सिंह तोमर द्वारा कोटेश्वर पैलेस में आयोजित होली मिलन समारोह को सम्बोधित करते हुए कही। इस अवसर पर केन्द्रीय मंत्री श्री ज्योतिरादित्य सिंधिया और ऊर्जा मंत्री श्री प्रद्युम्न सिंह तोमर ने कार्यक्रम में मौजूद कार्यकर्ताओं संग गुलाब के फूलों की वर्षा कर होली खेली। इस मौके पर संत कृपाल सिंह, भाजपा जिला अध्यक्ष श्री जयप्रकाश राजोरिया, प्रदेश मीडिया प्रभारी श्री आशीष अग्रवाल, भाजपा प्रदेश कार्यसमिति सदस्य श्री वेदप्रकाश शर्मा, श्री अशोक शर्मा,श्री ओम प्रकाश शेखावत, श्री अरविन्द राय, श्री राजकुमार परमार,श्री राजेश सोलंकी, पूर्व जिलाध्यक्ष श्री अभय चौधरी, श्री कमल माखीजानी, पूर्व विधायक श्रीमती इमरती देवी, पूर्व विधायक श्री रमेश अग्रवाल, श्री मुन्ना लाल गोयल, नगर निगम सभापति श्री मनोज तोमर, भाजपा मंडल अध्यक्ष, पदाधिकारी तथा कार्यकर्ता विशेष रूप से मौजूद रहे। 


केन्द्रीय संचार एवं पूर्वोत्तर क्षेत्र विकास मंत्री श्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कहा होली और रंग पंचमी ऐसे पर्व है जो हमें बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश देते हैं। उन्होंने होलिका दहन  की परंपरा का जिक्र करते हुए कहा तमाम कोशिशों के बाद भी हिरण्यकश्यप भक्त प्रहलाद को मारने में कामयाब नहीं हो सका। क्योंकि जो सत्य के रास्ते पर चलते हैं, ईश्वर उनके साथ रहता है। केन्द्रीय मंत्री ने कहा हमारी संस्कृति और परंपरा भी हमें यही सिखाती है कि सत्य के रास्ते पर चलो। उन्होंने कहा कि होली ऐसा त्यौहार है, जो कई विविधताएं लिए हुए है। ब्रज में अपने ढंग से होली मनाई जाती है, तो कोलकाता में  अपने ढंग से, लेकिन सभी इस पर्व पर दिल से दिल को मिलाते हैं। उन्होंने कहा होली हो या दिवाली देश की सीमाओं को पार कर गए हैं। श्रीलंका बांग्लादेश यूरोप और अमेरिका में भी होली और दिवाली मनाई जाती है। यह भारत की शक्ति का संकेत है, जो विश्व पटल पर उजागर हो रहा है।

इससे पहले होली मिलन समारोह  को संबोधित करते हुए ऊर्जा मंत्री श्री प्रद्युम्न सिंह तोमर ने कहा कि होली सिर्फ रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि प्रेम, सद्भावना और सांस्कृतिक विरासत को संजोने का पर्व भी है। होली को वसंत महोत्सव, रंगों का त्योहार और प्रेम व भाईचारे का प्रतीक है। यह त्योहार धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। इस अवसर पर ऊर्जा मंत्री ने पार्टी पदाधिकारी और कार्यकर्ताओं को कार्यक्रम के आयोजन की जानकारी दी। उन्होंने कार्यक्रम में उपस्थित पार्टी कार्यकर्ताओं को मंच से दंडवत प्रणाम किया। साथ ही केन्द्रीय मंत्री श्रीमंत ज्योतिरादित्य सिंधिया से निवेदन किया कि वह भी फूलों होली खेलें।

*ऊर्जा मंत्री ने किया रासलीला कलाकारों का सम्मान*

इस अवसर पर वृन्दावन से आए रासलीला कलाकारों ने रासलीला का मंचन किया तथा ऊर्जा मंत्री श्री प्रद्युम्न सिंह तोमर ने रासलीला कलाकारों को सम्मानित किया।

एक विदूषक से घबड़ाती राजसत्ता

क्या जमाना आ गया है कि राजसत्ता एक अदने से विदूषक से घबड़ाने लगी है। मुंबई में कुणाल कामरा नाम के एक विदूषक की पैरोडी के बाद एक वर्णसंकर  सियासी दल के कार्यकर्ताओं ने कुणाल के दफ्तर में जिस तरह से तबाही मचाई उसे देखकर लगता है कि  राजसत्ता कितनी कमजोर और असहिष्णु है। कुणाल ने किसी का नाम नहीं लिया । किसी को गाली नहीं दी ,लेकिन कहते हैं न कि-' चोर की दाढ़ी में तिनका ' होता है ,सो चोरों ने कुणाल को निशाने पर ले लिये। अब महाराष्ट्र की पूरी राजसत्ता कुणाल के खिलाफ राजदंड लिए खड़ी है। 

कोई माने या न माने किन्तु ये कटु सत्य है कि  भाजपा जब से सत्ता में आयी है तभी से देश में असहिष्णुता ,साम्प्रदायिकता,संकीर्णता और बेसब्री सीमा से ज्यादा बढ़ गयी है।  भाजपा सनातन की बात करती है ,भारतीय शिक्षा और संस्कारों की बात करती है लेकिन इसके बारे में शायद जानती कुछ भी नहीं है ।  यदि जानती होती तो कुणाल कामरा के शो को लेकर तालिबानों की तरह उसके ऊपर टूट न पड़ती। कामरा के शो को लेकर बवाल शिव सेना [एकनाथ शिंदे ]ने किया है। शिंदे के बारे में कुणाल ने जो कहा वो कटु सत्य है कि  शिंदे ने न सिर्फ मूल शिव सेना से गद्दारी की बल्कि अपना सियासी बल्दियत भी बदली। बस यही वो दुखती रग थी जिसके ऊपर हाथ रखने से एकनाथ के कार्यकर्ता गुंडई पर उतर ए और उन्होंने कुणाल को सजा देने का दुस्साहस दिखा दिया। 

शिवसेना हो या भाजपा या कांग्रेस जब भी सत्ता में आते हैं तब उनका चरित्र लगभग एक जैसा हो जाता है। कांग्रेस चूंकि लम्बे समय तक सत्ता में रही इसलिए इसने सब्र करना भी सीखा और हास्य बोध   भी पैदा किया ,अन्यथा कांग्रेस के राज में लक्ष्मण,शंकर,सुधीर तैलंग  या काक जैसे मशहूर व्यंग्य चित्रकार पनप न पाते।  न राग दरबारी लिखी जा सकती थी और न हरिशंकर परसाई जैसे लेखक जीवित रह पाते ।  परसाई जी को भी संघियों ने मारने की कोशिश की थी लेकिन वे अपनी कमर टूटने के बाद भी दशकों तक अपना काम करते रहे। शिवसेना को शायद ये पता नहीं है कि  शिवसेना का ट्रीटमेंट हो   या  संघ का ट्रीटमेंट ,किसी विदूषक को,किसी व्यंग्यकार को किसी हास्य कलाकार को उसका काम करने से रोक नहीं सकता। 

भारतीय ज्ञान परमपरा की वक़ालत करने वाले संघी और शिवसैनिक शायद भारतीय ज्ञान परंपरा को जानते ही नहीं है।  उन्हें पता  ही नहीं है कि  साहित्यमें ,नाटक में कितने रस होते हैं ? वे यदि ये सब जानते तो खुद अपने पुरखों की कला का सम्मान करते ।  शिवसेना के संस्थापक बाला साहब ठाकरे खुद  एक व्यग्यकार यानि विदूषकों की बिरादरी से आते थे।  व्यंग्य के लिए कलम हो,कूची हो या मंच हो एक सशक्त माध्यम होता है। हास्य कलाकर हिंदुस्तान में भी होते हैं और पाकिस्तान में भी।इंग्लैंड  में भी होते हैं और अमरीका में भी। जीवन में यदि हास्य और व्यंग्य न हो तो जीवन न सिर्फ नीरस हो बल्कि नर्क बन जाये ।  हास्य-व्यंग्य कलाकार या लेख जीवन को सरस् बनाता है। कटु सत्य को शक्कर में पागकर आपके सामने पेश करता है और ऐसा करना दुनिया के किसी भी मुल्क में अपराध नहीं है । केवल तालिबानी संस्कृति में हसने,व्यंग्य करने पर स्थाई रोक होती है। 

भारत की राजनीती में हास्य बोध   लगभग मर चुका है ,हमारे नेता अब व्यंग्य करने वले को,व्यंग्य लिखने वाले को अपना दुश्मन मानने लगे हैं यही वजह है कि  पिछले एक दशक में कुणाल कामरा हों या कीकू सभी को धमकियों का समाना करना पड़ता है ,जेल जाना पड़ता है। लेकिन परसाई के वंशज कभी हार नहीं मानते ।  कुणाल ने भी हार नहीं मानी है। उसे हार मानना भी  नहीं चाहिए। भाजपाई और शिवसेना के कार्यकर्ता शायद न चार्ली चैप्लिन को जानते   हैं और न हमारे यहां के बीरबल को ।  वे मुल्ला नसरुद्दीन को भी नहीं जानते उन्होंने मुंगेरीलाल के बारे में भी पढ़ा और सुना नहीं है। वे तो यदि कुछ सीखे हैं तो तालिबानियों से सीखे हैं / भाजपा को मुसलमानों से नफरत   है तो शिवसेना को बिहारियों और गैर मराठियों से। दोनों कानून को अपने हाथ में लेने में कोई संकोच नहीं करते,खासतौर पर वहां ,जहां उनकी अपनी सरकार हो। कुणाल कि हाथ में संविधान की प्रति देख उन्हें लगा की मंच पर कुणालंहिं राहुल गाँधी खड़े हैं। 

हमारे यहां जो तमाम शब्द लोकभाषा में प्रचलित और स्वीकार्य शब्द थे उन्हें भाजपा ने सत्ता में आते ही असंसदीय घोषित कर दिया। अर्थात आप उनका इस्तेमाल संसद के भीतर नहीं करसकते,किन्तु संसद  के बाहर सड़क या किसी और मंच पर इनका इस्तेमाल न अपराध है और न इन्हें प्रतिबंधित किया गया है।  कुणाल ने जिस ' गद्दार ' शब्द का इस्तेमाल अपने गीत में किया वो भी सरकार की नजर में असंसदीय है ।  संसद  की बुकलेट में ‘गद्दार’, ‘घड़ियाली आंसू’, ‘जयचंद’, ‘शकुनी’, ‘जुमलाजीवी’, ‘शर्मिंदा’, ‘धोखा’, ‘भ्रष्ट’, ‘नाटक’, ‘पाखंड’, ‘लॉलीपॉप’, ‘चाण्डाल चौकड़ी’, ‘अक्षम’, ‘गुल खिलाए’ और ‘पिठ्ठू’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल अब लोकसभा और राज्यसभा में अब असंसदीय माना गया है। मेरा तो एक उपन्यास ही ' गद्दार ' नाम से है।गनीमत है की कांग्रेस से भाजपाई हो चुके सिंधिया समर्थकों ने इस पर कोई बखेड़ा खड़ा नहीं किया। वैसे भी  राजनीति में गद्दारी और बाप बदलना एक आम मुहावरा है।  इसे सुनकर यदि कोई बमकता है तो उसे राजनीति छोड़ देना चाहिए। 

कुणाल कामरा कोई साहित्यकार नहीं है।  वे एक स्टेंडअप कॉमेडियन हैं। ये उनका व्यवसाय है।  ये व्यवसाय गैर कानूनी नहीं है ,इसलिए उनके ऊपर हुए हमले की ,उन्हें दी जाने वाली धमकियों की घोर निंदा की जाना चाहिए। हमारे यहां तो निंदकों तक को नियरे रखने की सलाह दी जाती है क्योंकि वे स्वभाव को बिना पानी-साबुन कि निर्मल करने का माद्दा रखते हैं। एक सभ्य समाज में यदि हास्य-व्यंग्य को लेकर सरकार की और से असहिष्णुता का प्रदर्शन किया जायेगा, कलाकारों को धमकाया जायेगा ,उन्हें जेलों में डाला जाएगा    तो लोकतंत्र जीवित नहीं रह सकता। हास्य-व्यंग्य कोई गाली नहीं हैं। ये अभिव्यक्ति का एक सशक्त माध्यम है ठीक उसी तरह जिस तरह की टीवी है,रेडियो है सोशल मीडिया है। इन सभी माध्यमों की सुरक्षा अनिवार्य है। इस मामले में देश की सरकार को ही नहीं बल्कि देश की सर्वोच्च न्यायपीठ को भी हस्तक्षेप करना चाहिए और कुणाल को ही नहीं  बल्कि हरिशंकर परसाई परम्परा को सांरक्षण देन चाहिए। अन्यथा वो दिन दूर नहीं जबआपको ताश के 52  पत्तों में से जोकर गायब नजर आये । 

@ राकेश अचल

सोमवार, 24 मार्च 2025

विनोद कुमार शुक्ल और ज्ञानपीठ पुरस्कार

 

मुझे आत्मीय ख़ुशी जब-तब ही होती है ।  पिछले वर्षों में  मुझे   ख़ुशी का अहसास बहुत कम हुआ है लेकिन पिछले दिनों जब कविवर श्री विनोद कुमार शुक्ल को ज्ञानपीठ पुरस्कार देने की घोषणा की गयी तब मुझे अत्यंत प्रसन्नता का अनुभव हुआ। साथ ही क्षोभ भी कि ये ज्ञानपीठ वाले कितने निर्मम हैं कि पुरस्कार देने का फैसला तब करते हैं जब लेखक की कमर झूल जाती है और वो इस तरह की सामाजिक स्वीकारोक्ति का आनंद नहीं ले पाता। शुक्ल जी को भी जब ज्ञानपीठ पुरस्कार देने की घोषणा की गयी तब वे 88  साल के हो गए हैं। 

वर्ष 2024 के लिए प्रतिष्ठित 59 वाँ ज्ञानपीठ पुरस्कार देने की घोषणा हुई है. यह भारत का सर्वोच्च साहित्यिक सम्मान है, जिसे भारतीय भाषाओं में उत्कृष्ट साहित्य के लिए दिया जाता है. इसके अंतर्गत 11 लाख रुपये की राशि, वाग्देवी की कांस्य प्रतिमा और प्रशस्ति पत्र प्रदान किया जाता है. विनोद कुमार शुक्ल हिन्दी के 12वें और छत्तीसगढ़ के पहले साहित्यकार हैं जिन्हें यह पुरस्कार मिला है। शुक्ल जी के खाते  में पहले से तमाम सरकारी और असरकारी पुरस्कारत तथा  सम्मान भरे पड़े हुए हैं इसलिए उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार ने बहुत रोमांचित किया होगा ऐसा मै नहीं मानता,लेकिन उन्हें भी ये संतोष  तो जरूर हुआ होगा की आज भी समाज सही और प्रासंगिक लेखन का सम्मान करता है। 

छत्तीसगढ़ जैसे पिछड़े राज्य में  रहने वाले विनोद कुमार शुक्ल को अभी तक किसी ने शहरी नक्सली सम्मान से नहीं जवाजा ये भी उनकी एक बड़ी उपलब्धि है अन्यथा उन्होंने जिस ढंग से कविता में,कहानी में,उपन्यासों में, और नाटकों में कहा है वो नक्सली प्रदेश के लेखक के लिए शहरी नक्सली कहे जाने के लिए ज्यादा नहीं है  तो कम भी नहीं  है।  शुक्ल जी अपने किस्म के एक अलग लेखक है ।  उनका उपन्यास ' नौकर  की कमीज ' तो साहित्य के हरेक पाठक ने पढ़ा ही होगा न पढ़ा हो तो अब मौका है उसे पढ़ने और शुक्ल जी को जानने का। मै अपने छात्र जीवन से ही शुक्ल जी के लेखन का ,उनकी साफगोई का कायल रहा हूँ। शुक्ल जी ने जो लिखा वो तुलसीदास की तरह स्वांत; सुखाय लिखा लेकिन उसमें जन हिताय भी शामिल रहा। 

अक्सर लेखक स्वांत; सुखाय ही लिखता है किन्तु उसके लेखन में सभी का सुख और सभी का दुःख शमिल होता है। विनोद कुमार शुक्ल जी का लेखन भी इसका अपवाद नहीं हैं ,किन्तु उनका लेखन सबसे अलग इसलिए है क्योंकि वे सबसे अलग होकर सोचते और लिखते हैं।  लेखन के जरिये ख्याति मिलना आसान काम नहीं ह।  ख्याति हमेशा सियासत से जुड़े लोगों के आगे-पीछे चक्कर लगाती रहती है किन्तु शुक्ल जी को ख्याति उनके लेखन से मिली। उस लेखन से मिली जो जन सरोकारों का लेखन है।  उन्होंने जिस समय में जो कुछ भी लिखा वो धारा के   विपरीत का लेखन है। शुक्ल जी के घर पर यदि कभी ईडी  या सीबीआई छापा मारती तो उसे नोटों के बंडल नहीं बल्कि किताबों का जखीरा और सम्मानों,स्मृति चिन्हों तथा प्रशंसा पत्रों का भंडार मिलता। शुक्ल जी ने   चाहे नाटक  'आदमी की औरत ' या पेड़ पर कमरा लिखा हो चाहे'  खिलेगा तो देखेंगे'  जैसा कोई उपन्यास। हमेशा अपने पाठक को चौंकाया है ,आंदोलित किया है। उनकी कविताएं या तो सीधे-सीधे समझ में आ जाती हैं या फिर आपको परेशान करती हैं। वे सादगी से ही लिखते हैं लेकिन उनके लेखन में जो तिलिस्म है उसे   भी समझा जाना चाहिए। अपनी आधी सदी से ज्यादा की लेखन यात्रा में विनोद कुमार शुक्ल न ठहरे,न टूटे,न बिखरे। वे सतत लिखते रहे और आज भी वे स्मृतियों का खजाना अपने पास रखते है।  अब कृषकाय हैं ,ज्यादा बोल नहीं सकते,ज्यादा लिख नहीं सकते लेकिन ज्यादा सोचते आज भी हैं वे। उन्होंने हिंदी साहित्य को जितना समृद्ध किया है उसका मूल्यांकन आने वाले पचास साल तक होता रहेगा। शुक्ल जी शतायु हों ।  ज्ञानपीठ पुरस्कार के लिए शुक्ल जी को उनके सूबे को और सभी साहित्यप्रेमियों को बहुत-बहुत बधाई और शुभकामनाएं। आपको बता दूँ किहिंदी में पहला ज्ञानपीठ पुरस्कार 1968 में सुमित्रानंदन पंत को दिया गया था । ये पुरस्कार एक उद्यमी 22  मई 1961 को भारतीय ज्ञानपीठ के संस्थापक श्री साहू शांति प्रसाद जैन के पचासवें जन्म दिवस के अवसर पर स्थापित किया गया था इसलिए कुछ लोग इसे बनियों का पुरस्कार भी कहते हैं।ये पुरस्कार देश की 22  भाषाओँ के साहित्य के लिए दिया जाता है। 

@ राकेश अचल

रविवार, 23 मार्च 2025

जस्टिस के खिलाफ जस्टिस आखिर कौन देगा ?

 

ऊँट पहाड़ के नीचे जब कभी आता है ,और जब आता है तब उसे पता लगता है के दुनिया में उसका कद आखिर कितना छोटा है। जस्टिस यशवंत वर्मा के मामले में यही सब हो रहा है। जस्टिस वर्मा के घर में हुए अग्निकांड के बाद मौके पर मिले रुपयों का ढेर भी मिला था।    सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस संजीव खन्ना ने जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ जांच के लिए तीन सदस्यीय कमेटी बनाई है। वर्मा के सरकारी आवास से कथित नकदी बरामद होने के बाद उन पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे हैं। जांच के दौरान वर्मा न्यायिक कार्य नहीं कर पाएंगे।सीजेआई संजीव खन्ना ने जिन तीन सदस्यों की कमेटी बनाई है उसमें जस्टिस शील नागू, जस्टिस जी.एस. संधावालिया और जस्टिस अनु शिवरामन शामिल हैं। सीजेआई खन्ना ने कहा कि जांच निष्पक्ष होनी चाहिए।

आपको बता दूँ की दिल्ली हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस डी. के. उपाध्याय ने जस्टिस यशवंत वर्मा के सरकारी आवास से कथित तौर पर कैश मिलने के मामले में एक रिपोर्ट पहले ही भारत के चीफ जस्टिस संजीव खन्ना को सौंप दी गयी  है। बताया जा रहा है कि जस्टिस उपाध्याय ने घटना के संबंध में सबूत और सूचनाएं जुटाने के लिए इन-हाउस जांच प्रक्रिया शुरू की थी और शुक्रवार को ही रिपोर्ट पेश कर दी है। अब सुप्रीम कोर्ट का कलीजियम इस रिपोर्ट की पड़ताल करेगा और फिर कोई कार्रवाई कर सकता है।

जस्टिस वर्मा भले आदमी है न और व्यावहारिक भी। वे न दूध के धुले हैं और न महाकुम्भ में उन्होंने कोई डुबकी  लगाईं है। नोटों से उनका प्रेम पुराना है। एके  रिपोर्ट के मुताबिक, 2018 में यूपी की सिम्भावली शुगर मिल में गड़बड़ी के मामले में जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ सीबीआई  ने प्रथिमिकी दर्ज की थी। जस्टिस वर्मा 2014 में इलाहाबाद हाई कोर्ट में जस्टिस बनाए जाने से पहले इस शुगर कंपनी में नॉन-इग्जेक्युटिव डायरेक्टर थे।

जस्टिस यशवंत वर्मा  ५६ इंच के सीने वाले जस्टिस हैं उन्होंने  अपने सरकारी आवास पर नोट बरामदगी विवाद में लगे आरोपों को बेबुनियाद बताया है।  भारतीय न्यायपालिका में भ्र्ष्टाचार के बारे में कोई आधिकारिक जानकारी कम से कम गूगल के पास तो नहीं है लेकिन गरोक गुरु बताते हैं कीन्यायपालिका में भ्रष्टाचार के कई रूप देखे जा सकते हैं, जैसे रिश्वतखोरी, पक्षपात, राजनीतिक दबाव और पारदर्शिता की कमी। निचली अदालतों से लेकर उच्च स्तर तक, कुछ मामलों में जजों और अदालती कर्मचारियों पर अनुचित प्रभाव डालने या लाभ लेने के आरोप लगे हैं। उदाहरण के लिए, 2011 में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज मार्कंडेय काटजू ने न्यायिक भ्रष्टाचार की ओर इशारा किया था, और 2012 में "कैश-फॉर-बेल" घोटाले ने सुर्खियां बटोरी थीं, जिसमें जमानत के लिए पैसे लेने के आरोप लगे थे। इसके अलावा, लंबित मामलों की भारी संख्या (मार्च 2025 तक 4.7 करोड़ से अधिक) और न्यायिक नियुक्तियों में देरी भी भ्रष्टाचार के अवसर पैदा करते हैं, क्योंकि यह प्रक्रिया को धीमा और अपारदर्शी बनाता है। 

जहाँ तक मुझे याद है की भ्र्ष्टाचार के मामलों में आरोपी जजों के खिलाफ कार्रवाई करने में भारत बहुत ज्यादा गंभीर नहीं है। आपको यद् होगा की 1993  में सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस वी. रामास्वामी पर वित्तीय अनियमितताओं और कदाचार के आरोप लगे थे। उनके खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लोकसभा में पेश किया गया, लेकिन यह आवश्यक बहुमत हासिल नहीं कर सका और असफल रहा। यह भारत में पहला मौका था जब किसी जज के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव वोटिंग तक पहुंचा। हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजों के खिलाफ समय-समय पर महाभियोग के लिए प्रस्ताव लाने की कोशिश हुई है, जैसे कि जस्टिस सौमित्र सेन (कलकत्ता हाई कोर्ट) के खिलाफ 2011 में। राज्यसभा में उनके खिलाफ प्रस्ताव पारित हुआ था, लेकिन लोकसभा में वोटिंग से पहले ही उन्होंने इस्तीफा दे दिया। इसी तरह, कुछ अन्य मामलों में जजों ने जांच या महाभियोग की प्रक्रिया आगे बढ़ने से पहले इस्तीफा दे दिया।

मुझे लगता है की जस्टिस वर्मा के मामले में भी कुछ होने वाला नहीं है। न्यायपालिका की बदनामी बचने के लिए जस्टिस वर्मा के खिलाफ जांच का कोई नतीजा जनता के सामने नहीं आएगा। भारत का मीडिया भी जस्टिस वर्मा के खिलाफ कोई नयी खोज नहीं कर पायेग।  कोई राजनितिक दल तो ईद मुद्दे पर कुछ बोलने  वाला है ही नहीं। हमारे यहां जस्टिस के लिए चुने जाने वाले लोग इनजस्टिस भी करें तो उनके खिलाफ कोई भी कार्रवाई आसानी से नहीं होती। जस्टिस साहिबान को कंबल ओढ़कर घी पीने की आजादी अघोषित रूप से दी गयी है ,ठीक उसी तरह जैसे जस्टिस मिश्रा को बलात्कार के मामले में ये कहने की आजादी है की किसी लड़की के स्तन छूना और उसका नाडा खोलना बलात्कार नहीं है। 

@ राकेश अचल

शनिवार, 22 मार्च 2025

एसएसपी ग्वालियर ने जिले के थाना प्रभारियों की ली बैठक

 ग्वालियर 22 मार्च।  पुलिस कन्ट्रोल रूम सभागार में वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक ग्वालियर श्री धर्मवीर सिंह द्वारा ग्वालियर जिले समस्त थाना प्रभारियों की  15 मार्च से 15 अप्रैल तक चलाये जा रहे निगरानी फाइल को अपडेट संबंधी अभियान तथा लंबित महिला संबंधी एवं एससी एसटी के अपराधों, जप्ती माल के निराकरण, रिकॉर्ड का बेहतर संधारण, थानों में साफ सफाई सहित थानों को आईएसओ सर्टिफिकेशन के लिये कार्य करने के संबंध में बैठक ली गई।

 बैठक में अति. पुलिस अधीक्षक(पूर्व/यातायात/अपराध) श्री कृष्ण लालचंदानी, अति. पुलिस अधीक्षक(मध्य) श्रीमती सुमन गुर्जर, अति. पुलिस अधीक्षक(पश्चिम) श्री गजेन्द्र वर्धमान, अति. पुलिस अधीक्षक(ग्रामीण) श्री निरंजन शर्मा सहित समस्त राजपत्रित अधिकारी एवं थाना प्रभारीगण उपस्थित रहे।
बैठक के प्रारम्भ में वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक ग्वालियर द्वारा दिनांक 15 मार्च से 15 अप्रैल तक चलाये जा रहे निगरानी फाइलों को अपडेट करने के संबंध में समीक्षा की और थानों द्वारा तैयार की गई निगरानी फाइलों को चेक किया जाकर उन्हे 30 मार्च तक अपडेट करने के लिये कहा और आदतन अपराधियों की नवीन निगरानी फाइल खोलने के निर्देश दिये।
     थाना प्रभारियों एवं राजपत्रित अधिकारियों को  निगरानी फाइलों में अपनी टीप आवश्यक रूप से अंकित करने के निर्देश दिये और कहा कि जो निगरानी बदमाश विगत 05 साल से शांतिपूर्ण तरीके से अपना जीवन यापन कर रहे हैं उन्हे निगरानी से माफी में लाने की कार्यवाही की जाए तथा ऐसे निगरानी बदमाश जो अन्य जिलों में जाकर बस गये हैं उनकी निगरानी फाइलों को संबंधित जिलों में स्थानांतरित की जाएं। बैठक में उन्होंने लंबित मर्ग का शीघ्र निकाल करने के निर्देश दिए साथ ही उन्होने कहा कि दुष्कर्म एवं पॉक्सो एक्ट के मामलों को अनावश्यक लंबित न रखा जाए समयसीमा में ऐसे मामलों में चालानी कार्यवाही सुनिश्चित की जाए और एससी/एसटी के लंबित मामलों का भी गंभीरता से निराकरण करने के प्रयास किये जाएं।

भगवान अमित शाह को शक्ति प्रदान करे

 

मैं केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के मुंह में घी-शक्कर भर देना चाहता हूँ ,क्योंकि उन्होंने संसद में  अहम घोषणा करते हुए कहा कि 31 मार्च 2026 से पहले देश के सभी हिस्सों से नक्सलवाद पूरी तरह खत्म हो जाएगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार ने नक्सलवाद को जड़ से खत्म करने का संकल्प लिया है। 375 दिन में नक्सली खत्म, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की इस गारंटी को पूरा करने में सीआरपीएफ, डीआरजी, एसटीएफ, बीएसएफ और आईटीबीपी के जवान जुट गए हैं।गूगल की परिभाषा के मुताबिक नक्सलवाद साम्यवादी क्रान्तिकारियों के उस आन्दोलन का अनौपचारिक नाम है जो भारतीय कम्युनिस्ट आन्दोलन के फलस्वरूप उत्पन्न हुआ।

सब जानते हैं कि नक्सलवाद  से अकेले छत्तीसगढ़  ही नहीं अपितु ओडिशा,महाराष्ट्र और झारखण्ड भी बुरी तरह प्रभावित रहा है। चूंकि ये एक उग्र संगठित आंदोलन है इसलिए इसके समर्थक भी हैं और ये विचार जंगलों से चलकर शहरों तक आ चुका है इसीलिए शहरों में रहकर काम करने वाले नक्सलियों को ' अर्बन नक्सली ' कहा जाने लगा है ,हालाँकि ये एक गलत परिभाषा है। क्योंकि शहरी नक्सलियों के पास बंदूकें नहीं किताबें और बुद्धिबल होता है। 

बहरहाल देश को नक्सलियों से मुक्ति दिलाने की बात हो रही है ।  देश में यदि सरकार चाहे तो कोई भी वाद समाप्त किया जा सकता है ,वो भी बिना बन्दूक के। लेकिन हर सरकार नक्सलवाद से बन्दूक से निबटती  आयी है। नकस्लवाद के खिलाफ लड़ते हुए सरकारों ने अपने तमाम अर्धसैन्य बल को खपाया ह।  बड़ी तादाद में हमारे जवान मारे गए हैं ,नक्सल विरोधी अभियान में जितने नक्सली मारे गए उससे ज्यादा वे आदिवासी मारे गए जो एक तरफ नक्सलियों से परेशान होते हैं और दूसरी तरफ पुलिस से। नक्सलियों के नाम पर निर्दोष आदिवासियों को फर्जी मुठभेड़ों में मरने की सैकड़ों वारदातें देश में हो चुकी हैं। 

सवाल ये है कि  क्या सचमुच नक्सलवाद समाप्त हो जायेगा ।  यदि सरकारी दावों को सही माना जाये तो  गृह मंत्री की इस मुहिम का असर दिखने लगा है। घने जंगल में और नक्सलियों के गढ़ में पहुंचकर सीआरपीएफ व दूसरे बलों के जवान 48 घंटे में 'फॉरवर्ड ऑपरेटिंग बेस' स्थापित कर रहे हैं। अब इसी एफओबी के चक्रव्यूह में फंसकर नक्सली मारे जा रहे हैं। सुरक्षा बलों ने ऐसा जाल बिछाया है कि जिसमें नक्सलियों के पास दो ही विकल्प बचते हैं। एक, वे सरेंडर कर दें और दूसरा, सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड़ में गोली खाने के लिए तैयार रहें। 

आधिकारिक जानकारी के मुताबिक नक्सलियों के गढ़ में अभी तक 290 से ज्यादा कैंप स्थापित किए जा चुके हैं। 2024 में 58 कैंप स्थापित हुए थे। इस वर्ष 88 कैंप यानी एफओबी स्थापित किए जाने के प्रस्ताव पर काम शुरु हो चुका है। ये कैंप नक्सल के किले को ढहाने में आखिरी किल साबित हो रहे हैं। जिस तेजी से 'फॉरवर्ड ऑपरेटिंग बेस' स्थापित हो रहे हैं, उससे यह बात साफ है कि तय अवधि में नक्सलवाद को खत्म कर दिया जाएगा। सुरक्षा बल, नक्सलियों के गढ़ में जाकर उन्हें ललकार रहे हैं। 

इस साल जनवरी में ओडिशा और छत्तीसगढ़ के बॉर्डर क्षेत्र, गरियाबंद में  ऑपरेशन ग्रुप ई30, सीआरपीएफ कोबरा 207, सीआरपीएफ 65 एवं 211 बटालियन और एसओजी (स्पेशल ऑपरेशंस ग्रुप) की संयुक्त पार्टी के साथ हुई एक बड़ी मुठभेड़ में 16 नक्सली मारे गए थे। भारी संख्या में हथियार और गोला बारूद बरामद हुआ। उस ऑपरेशन में एक करोड़ रुपये का इनामी नक्सली जयराम चलपती भी ढेर हुआ था। फरवरी में बीजापुर के नेशनल पार्क इलाके में हुई मुठभेड़ में 29 नक्सली मारे गए थे।नक्सलियों के हमलों में भी बड़ी संख्या में नागरिक और पुलिस तथा अर्धसैन्य बल के जवान भी मारे जाते रहे हैं। 

एक जमाने में मध्य्प्रदेश और बिहार में डाकुओं का आतंक भी ठीक वैसा ही था जैसा इन राज्यों में डकैतों का था ।  मप्र में डकैत उन्मूलन २००६ में पूरा हो गया ।  अब चम्ब्ल के बीहड़ सूने पड़े हैं। चंबल में आखरी सूचीबद्ध डाको गिरोह जे जे उर्फ़ जगजीवन परिहार का मारा गया था अब पुलिस रिकार्ड में सूचीबद्ध गिरोह हैं लेकिन बराये नाम। डाकुओं की तरह नक्सलियों का खतम आसान नहीं है क्योंकि नक्सली एक राजनीतिक विचारधारा से जुड़े हैं। डाकुओं की कोई राजनीतिक विचारधारा नहीं थी  इसलिए उनका खात्मा आसान रहा है। नक्सलियों के साथ ऐसा नहीं है। लेकिन यदि सरकार चाहे तो नक्सल समस्या का हल हो सकता है। लेकिन देश के वनवासी इलाकों के लिए जिस तरह की नीतियां सरकार बनाती है उनसे नक्सलवाद का सामना करना आसान नहीं है ।यदि होता तो नक्सलवाद अब तक समाप्त हो चुका होता। 

आपको बता दें कि  नक्सलियों से निबटने के लिए हर सरकार ने काम किया फिर चाहे वो कांग्रेस की सरकार रही हो  या भाजपा की  या वामपंथियों की सरकार। सबने नक्सल्वाद को बन्दूक से समाप्त करने की कोशिश की। मैंने अपने छात्र जीवन में पढ़ा था कि  नक्सलियों के खिलाफ सबसे बड़ा अभियान  स्टीपेलचेस अभियान था वर्ष  1971 में चलाया गए इस  इस अभियान में भारतीय सेना तथा राज्य पुलिस ने भाग लिया था। अभियान के दौरान लगभग 20,000 नक्सली मारे गए थे।लेकिन इस महा अभियान के बाद भी नक्सलवाद समूल समाप्त नहीं  हुआ। दूसरा बड़ा अभियान  वर्ष 2009 में ग्रीनहंट के नाम से चलाया गया। । इस अभियान में पैरामिलेट्री बल तथा राष्ट्र पुलिस ने भाग लिया। यह अभियान छत्तीसगढ़, झारखंड, आंध्र प्रदेश तथा महाराष्ट्र में चलाया गया। कोई सात साल पहले 3 जून, 2017 को छत्तीसगढ़ राज्य के सुकमा जिले में सुरक्षा बलों द्वारा अब तक के सबसे बड़े नक्सल विरोधी अभियान ‘प्रहार’ को प्रारंभ किया गया। किया गया।एक जमाने में हमारे मित्र और भारतीय प्रशासनिक सेवा के पूर्व अधिकारी केएस शर्मा ने भी इस अभियान को गांधीवादी तरिके से समाप्त करने की कोशिश की थी लेकिन उसे सरकारों का ज्यादा समर्थन नहीं मिला। 

बहरहाल नक्सलवाद के खिलाफ जंगलों से लेकर शहरों तक में अभियान जारी है। अब देखना है की भाजपा इस मामले में कितनी  कामयाब होती है। 

@ राकेश अचल

शुक्रवार, 21 मार्च 2025

ज्योतिषाचार्य डॉ हुकुमचंद जैन दिल्ली में सम्मानित हुए

अखिल भारतीय जैन ज्योतिषाचार्य परिषद द्वारा भारत की राजधानी दिल्ली में दो दिवसीय ज्योतिष महाकुंभ का आयोजन संस्था के संस्थापक रवि जैन गुरु जी की अध्यक्षता एवं  बालयोगी  आचार्य सौभाग्य सागर जी आचार्य श्रुत सागर जी महाराज जी के मंगल आशीर्वाद एवं सानिध्य  में 18,19 मार्च 2025 को ग्रीन पार्क एवं कुंद कुंद भारती में  संपन्न हुआ।

इस अधिवेशन में देश से दिल्ली प्रांत के अलावा,उत्तरप्रदेश,हरियाणा,महाराष्ट्र,कर्नाटक, मध्यप्रदेश, राजस्थान आदि प्रांतों के सैकड़ों ज्योतिष विद्वानों ने भाग लिया।

मध्य प्रदेश ग्वालियर  से ज्योतिषाचार्य डॉ हुकुमचंद जैन ने भी इस अवसर पर  अपने विचार रखे।

ग्रीन पार्क समिति एवं कुंद कुंद भारती ट्रस्ट ने उन्हें सम्मानित किया।

ज्ञात रहे जैन  ज्योतिषाचार्य विगत 26 वर्षों से लगातार ज्योतिष के क्षेत्र में कार्य करते हुए ज्योतिष के माध्यम से अनेक जटिल मुद्दों पर भविष्यवाणी करते रहे हैं जो अक्सर कर समय समय पर सत्य सिद्ध हुई है।


गुरुवार, 20 मार्च 2025

मिशन से कमीशन तक पहुंची पत्रकारिता:अनिल तिवारी

 “एआई के दौर में बदलती पत्रकारिता और उसकी चुनौतियां“ विषय पर आयोजित व्याखान

ग्वालियर 20 मार्च । आजादी से पूर्व पत्रकारिता एक मिशन हुआ करती थी। स्वतंत्रता के बाद फैशन बनी और  मौजूदा परिवेश में कमीशन तक पहुंच गई है पत्रकारिता। यह कहना था मुंबई के प्रतिष्ठित हिंदी समाचार-पत्र “सामना“ के कार्यकारी संपादक अनिल तिवारी का। 

इंटरनेशनल सेंटर ऑफ मीडिया एक्सीलेंस (आईकॉम) पर “एआई के दौर में बदलती पत्रकारिता और उसकी चुनौतियां“ विषय पर आयोजित व्याखान में मुख्यवक्ता के तौर बोलते हुए यह बात कही। 

सेंटर डायरेक्टर डॉ. केशव पाण्डेय ने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि सामना जैसे समाचार-पत्र पत्रकारिता को नई दिशा प्रदान करते हैं। पत्रकारिता के क्षेत्र में कदम बढ़ाने वाले युवाओं को समझना और जानना होगा कि आधुनिक परिवेश की पत्रकारिता में आने वाली चुनौतियां क्या हैं और उनसे कैसे पार पाया जा सकता है? कार्यक्रम का संचालन प्रतिभा दुबे ने तथा आभार व्यक्त संपादक विजय पाण्डेय ने किया। 

एआई का करें बेहतर इस्तेमाल 

मुख्य वक्ता तिवारी ने कहा कि पत्रकारिता में आज कई बड़ी चुनौतिया हैं। तकनीक के बढ़ते प्रभाव से काम आसान हुआ है। जिस स्टोरी को बनाने में तीन घंटे लगते थे उसे एआई तीन मिनट में बना कर देता है, तो सोचिए हमारा स्थान कहां हैं? ऐसे में जरूरी हो जाता है कि एआई को टूल के रूप में इस्तेमाल करें न कि उससे प्रतिस्पर्धा। जिससे कि समय के साथ होने वाले बदलाव को अवसरों में बदला जा सके। हमें तकनीक को अपने से आगे नहीं होने देना है। तभी हम टिक पाएंगे। 

डिजिटल युग में आज कट और पेस्ट का जमाना है। सबकुछ एक क्लिक पर मौजूद है लेकिन आज का युवा आज में जी रहा है न वह भविष्य को देख रहा है और न हीं भूत को। पत्रकार एक आम आदमी होता है लेकिन उसके देखने, सोचने और लिखने का नजरिया ही उसे खास बनाता है। इसलिए समय के साथ अपने को बदलें और अपडेट होते रहें, नहीं तो वक्त के साथ पिछड़ जाएंगे। 

पत्रकारों ने किया सम्मानित 

व्याख्यान के बाद सर्व प्रथम सांध्य समाचार के प्रधान संपादक डॉ. केशव पाण्डेय ने शॉल, श्रीफल और स्मृति चिंह भेंट कर तिवारी का नागरिक अभिनंदन किया। इस दौरान वरिष्ठ पत्रकार रामबाबू कटारे, सुरेश शर्मा, राजेश शर्मा, देव श्रीमाली, प्रमोद भार्गव, प्रवीण दुबे, विजय पाराशर, जावेद खा, जितेंद्र जादौन, आशीष मिश्रा, एवं विनोद शर्मा सहित अनेक पत्रकारों ने भी उनका सम्मान किया।


कलेक्ट्रेट परिसर में अग्नि दुर्घटना

कलेक्टर तत्काल मौके पर पहुंची,जांच के दिये आदेश 

ग्वालियर 20 मार्च ।  कलेक्ट्रेट परिसर में गुरुवार की सुबह शॉर्ट सर्किट के कारण अग्नि दुर्घटना की सूचना मिलते ही कलेक्टर श्रीमती रुचिका चौहान तत्काल मौके पर पहुँची। उन्होंने  अग्नि दुर्घटना से प्रभावित कोषालय , महिला एवं बाल विकास विभाग के साथ अन्य विभागों के कार्यालयों का निरीक्षण किया। अग्नि दुर्घटना के कारण कोई क्षति नहीं हुई है। कलेक्टर ने इस घटना के कारणों की जांच के आदेश  दिए हैं। अग्नि दुर्घटना शॉर्ट सर्किट के कारण होना बताई गई है ।

बुधवार, 19 मार्च 2025

कलियुग का बीरबल है मस्क का ग्रोक


आजकल भारत में ' ग्रोक ' का हल्ला है। ग्रोक एक ऐसा चैटबॉक्स है जो आपके हर सवाल का जबाब देता है। बेझिझक देता है। लाजबाब है। हाजिर जबाब है। इन दिनों भारत में लोग ग्रोक को अपना गुरू मानने लगे है । ग्रोक एक ऐसा गुरु है जो जाति,धर्म और लिंग भेद से बहुत ऊपर है।  ग्रोक ठेठ समाजवादी है। सबके लिए उपलब्ध है। ग्रोक दुनिया में किसी की नहीं सुनता सिवाय अपने मालिक एलन मस्क के। भारत के लोग जब राम मंदिर बना रहे थे, कुम्भ में डुबकियां लगा रहे थे। तब एलन मास्क ग्रोक को अमली जामा पहना रहे थे। 
आपने भी शायद मेरी तरह बचपन में अकबर-बीरबल के किस्से सुने होंगे ।  मुल्ला नसरुद्दीन की कहानियां सुनी होंगीं। जो हर सवाल का जबाब देने में माहिर  थे।  बीरबल की बुद्धिमत्ता के सामने मुग़ले  आजम अकबर भी नतमस्तक हो जाते थे। कृत्रिम  बुद्धिमत्ता की तकनीक के जमाने में आम जनता अकबर है और ग्रोक बीरबल। बस आप सवाल कीजिये और ग्रोक गुरु पलक झपकते आपके सवाल का जबाब पेश कर देंगे। अभी तक ये काम गूगल गुरु के जिम्मे था लेकिन अब ग्रोक ने गूगल गुरु को भी पछाड़   दिया है।ग्रोक 3 "पृथ्वी का सबसे स्मार्ट एआई"  है। 
दरअसल आज दुनिया के तमाम मुल्कों में फांसीवादी और तानाशाही प्रवृत्तियां तेजी से सिर उठा रही है। दुनिया के तमाम सत्ताप्रतिष्ठान अपनी जनता के सवालों के जबाब देने के लिए राजी नहीं हैं ,ऐसे में ग्रोक-3  के अवतरण ने लोगों को चौंका दिया है ।  लोग ग्रोक के दीवाने हो गए हैं। ग्रोक वे सब जानकारियां दे रहा है जो सत्ता प्रतिष्ठान छुपाने की कोशिश करता है।
ग्रोक अभी भारत,ऑस्ट्रेलिया ,फिलीपींस और दो अन्य देशों के लिए ही उपलब्ध है। अमेरिका को ग्रोक की जरूरत नहीं है।चीन की और ग्रोक देख नहीं सकता।  भारत के नेता ग्रोक से आतंकित हैं क्योंकि ग्रोक दूध का दूध ,पानी  का पानी करता दिखाई दे रहा है।  भारत की सरकार ने बीबीसी द्वारा मोदी जी को लेकर बनाई गयी फिल्म प्रतिबंधित कर दी थी लेकिन ग्रोक 3  को प्रतिबंधित नहीं किया गया है। किया भी नहीं जा सकता क्योंकि ग्रोक उस एलन मस्क का दास है जिसके घर आदरणीय मोदी जी बच्चे खिलाने  गए थे। 
आपको सरल भाषा में बताऊँ तो अब ग्रोक कलिकाल का  सबसे बड़ा और प्रामाणिक गुरु है।  आज की पीढ़ी  को यदि गुरु के बारे में बताया जाएगा तो कहा जाएगा 
ग्रोक ब्रम्हा,ग्रोक विष्णु,ग्रोक देवो महेश्वरा 
ग्रोक साक्षात् परमब्रम्ह तस्मै ,श्री ग्रोको नमो नम:
ग्रोक कृत्रिम बुद्धि का ऐसा अनूठा उदाहरण है जो आभासी दुनिया के किसी भी मंचपर उयलब्ध किसी भी सूचना का विश्लेषण कर आपके सामने उपस्थित हो जाता है ,वो भी पलक झपकते हुए। ग्रोक त्रिनेत्र है। ग्रोक आभासी दुनिया पर मौजूद तस्वीरों,वेब सूचनाओं और पीडीएफ फाइलों को पढ़ने में समर्थ है ग्रोक की तीक्ष्ण बुद्धि का आधार उसका विशाल डाटा संग्रह है। इस समय दुनिया में 400  से अधिक सोशल मीडया मंच उपलब्ध हैं लेकिन इनमें   20  ही ज्यादा प्रचलन में हैं। ग्रोक-3  इन सबसे ऊपर है। सबसे आगे है। ग्रोक के रहते आपको कोई पप्पू नहीं बना सकता ,जैसे कि भारत में भाजपा और संघ ने राहुल गांधी को पप्पू बना दिया था। ग्रोक जनता को पप्पू के बारे में असली और प्रामाणिक सूचनाएं देने में समर्थ है ,
प्रश्नाकुल  भारतीय समाज के लिए ग्रोक एक अजूबा है। लोग ग्रोक से वे सब सवाल कर रहे हैं जिनका उत्तर उसे सत्ता प्रतिष्ठान  की और से नहीं मिल रहा। जनता जितना राहुल गाँधी के बारे में सवाल कर रही है, उससे ज्यादा प्रधानमंत्री मोदीजी के बारे में सवाल कर रही है।  ग्रोक जनता को दोनों की हकीकत बता रहा है।  ग्रोक के मुंहफट होने से सत्ता प्रतिष्ठान भयभीत है। सत्ता प्रतिष्ठान कोआशंका है कि  ग्रोक भाजपा और संघ  का तिलस्म तोड़ सकता है। अब भारत की सरकार के सामने दो ही विकल्प हैं । पहला ये कि  ग्रोक को प्रतिबनाधित किया जाये और दूसरा ग्रोक से समझौता कर लिया जाये। ग्रोक को प्रतिबंधित करना भारत सरकार के लिए आसान नहीं है ,क्योंकि ग्रोक उन एलोन मस्क का उत्पाद है जो दुनिया के महाबली अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का दायां हाथ है। 
ग्रोक के प्रहार से बचने का दूसरा रास्ता मस्क से समझौता करना है। भारत की सरकार यदि मस्क के लिए भारत में कारोबार   का दरवाजा खोल दे तो मुमकिन है कि  मस्क ग्रोक की चाबी ऐंठ दें।  उसकी प्रोग्रामिंग को इस तरह बदल दें कि  वो मोदी जी की तरह सफेद सच के साथ सफेद झूठ भी बोलने लगे। ग्रोक कठपुतली नहीं है। ग्रोक मस्क के इशारों पर नर्तन करने वाली तकनीक है ,जो निर्बाध रूप से सभी को उपलब्ध है। आने वाले दिनों में ग्रोक भारतीय राजनीति की दशा और दिशा को कितना प्रभावित कर पाएगा कहना कठिन है। लेकिन जिस देश में मुद्दों के बजाय मुर्दों पर सियासत हो रही हो उस देश के लिए ग्रोक एक बड़ी समस्या बनने जा रहे हैं। ग्रोक न औरंगजेब के साथ है और न मोदी जी के साथ ।  ग्रोक न कांग्रेस  के साथ है और न समाजवादियों के साथ। ग्रोक अभी सच के साथ है। सत्यम,शिवम,सुंदरम जैसा है। 
आप सोच रहे होंगे कि  भूलोक के इस नए गुरु का नाम ग्रोक क्यों रखा गया ? तो आपको बता दूँ ग्रोक  शब्द रॉबर्ट हेनलेन के नोवल ' स्ट्रेंजर  इन  ए स्ट्रेंज  लैंड ' से आया है। इसका उपयोग मंगल ग्रह पर पले-बढ़े एक किरदार  द्वारा किया जाता है और इसका मतलब किसी चीज को पूरी तरह और गहराई से समझना है। कुल मिलाकर लोग ग्रोक के आगमन से खुश हैं। आप केवल मोदी जी या राहुल जी के बारे में ही नहीं बल्कि अपने बारे में भी सवाल कर सकते हैं। ग्रोक शायद ही आपको निराश करे ! भगवान ग्रोक को लम्बी उम्र दे ताकि ग्रोक प्रश्नाकुल समाज की जिज्ञासाओं को लगातार शांत करता रहे। 
@ राकेश अचल

मंगलवार, 18 मार्च 2025

समस्याओं को लेकर दलित आदिवासी महापंचायत ने जनसुनवाई में पत्र दिए

 जनजाति कार्य विभाग के प्राचार्य प्रभारी सहायक राकेश गुप्ता को निलंबित करने शासकीय जमीनों को विक्रय पर प्रतिबंध लगाने नगर पालिका डबरा की समस्याओं को लेकर दलित आदिवासी महापंचायत ने जनसुनवाई में पत्र दिए

ग्वालियर 18 मार्च  । दलित आदिवासी महापंचायत ( दाम ) के पदाधिकारी आज अलग-अलग समस्याओं को लेकर कलेक्टर ग्वालियर की जनसुनवाई में पूर्व आईएएस स्वर्गीय टी धर्माराव जो कलेक्ट्रेट में पहुंचे जनसुनवाई में पहुंचने वाले गलत आदिवासी महापंचायत के संस्थापक संरक्षक डॉक्टर जबर सिंह अग्र प्रांतीय अध्यक्ष महेश मधुरिया कार्यवाहक प्रांत अध्यक्ष महाराज सिंह राजोरिया जिला अध्यक्ष संदीप सोलंकी डबरा नगर पालिका परिषद की पार्षद सुनीता राजोरिया आदि शामिल थे।

 डॉक्टर जबर सिंह अग्र और महेश मधुरिया ने आदिम जाति कल्याण विभाग की समस्याओं को लेकर जनसुनवाई में समस्याओं के निराकरण करने की मांग की गई साथ ही आदिम जाति कल्याण विभाग के प्राचार्य प्रभारी सहायक आयुक्त राकेश गुप्ता को निलंबित करने की मांग की गई राकेश गुप्ता वरिष्ठ कार्यालय अधिकारियों को तत्वों को छुपा कर प्रतिवेदन भेजने हैं और भ्रष्टाचार के माध्यम से शासन के नियम कानून को ताकपर रखकर कार्य कर रहे हैं पत्र में इस बात का भी उल्लेख किया गया है की राकेश गुप्ता द्वारा एक लव्य विद्यालय कराहल में 40 लाख का भ्रष्टाचार किया गया है लेनदेन करके जांच को दबा दिया है जांच में दोषी है सीएम हेल्पलाइन में झूठा अपडेट करते हैं और सीएम हेल्पलाइन का समय सीमा में निराकरण नहीं करते हैं कर्मचारियों को वेतन भी नहीं दे रहे हैं कई कर्मचारियों के लंबित देयकों का भुगतान नहीं कर रहे है तथा छात्रवृत्ति और आर्थिक सहायता में भ्रष्टाचार अपना कर कार्य कर रहे हैं ऐसे प्रभारी सहायक आयुक्त राकेश गुप्ता को निलंबित किया जाए और निष्पक्ष जांच हेतु किसी डिप्टी कलेक्टर को प्रभारी सहायक बनाये जाने की मांग की गई है दलित आदिवासी महापंचायत के कार्यवाहक प्रांत अध्यक्ष महाराज सिंह राजोरिया ने शासकीय भूमि को विक्रय से रोक लगाने की मांग की गई है और सही जमीनों के नामांतरण करने की मांग की गई है आम जनता परेशान हो रही है डबरा में साथ ही पार्षद सुनीता राजोरिया ने नगर पालिका परिषद डबरा की जनता की समस्याओं से जनसुनवाई में अवगत कराया और समस्या का निराकरण करने की मांग की गई चारों समस्याओं के आवेदनों को जनसुनवाई में दर्ज किया गया और सभी समस्याओं पर शीघ्र ही कार्रवाही करने के संबंध मे अधिकारियों को निर्देश दिए दलित आदिवासी महापंचायत ( दाम ) के नेताओं को बरिष्ठ अधिकारियों ने आस्वसत किया है कि समस्याओं का शीघ्र निराकरण किया जाएगा ।

मप्र नौकरशाही के भगवाकरण का श्रीगणेश

मध्य्प्रदेश में जो अब तक नहीं हुआ था,वो अब हो रहा है।  मध्य्प्रदेश में 2003  से अभी तक भाजपा की सरकार है। 19  महीने की कांग्रेस सरकार एक अपवाद थी। इस लंबे कार्यकाल में भाजपा ने प्रदेश में बहुत से नवाचार किये लेकिन पहली बार प्रदेश की नौकरशाही का भगवाकरण शुरू हुआ है वो भी सामंतों के शहर ग्वालियर से। ग्वालियर कलेक्टर श्रीमती रुचिका सिंह और निगमायुक्त संघप्रिय ने भाजपा द्वारा आयोजित होली मिलन समारोह में न सिर्फ भाग लिया बल्कि भाजपा नेताओं के साथ तस्वीरें खिंचवाईं और गले में भगवा दुपट्टे डलवाये। 

मेरे पांच दशक की  पत्रकारिता के अनुभव में ऐसे दृश्य पहले कभी देखने को नहीं मिले ,इसलिए मै चौंका भी और मुझे कुछ अटपटा भी लगा।सवाल ये है कि क्या भारतीय प्रशासनिक सेवा के अफसरों को किसी राजनीतिक दल के कार्यक्रम में शामिल होने का संवैधानिक अधिकार है ? या लोकसेवकों की कोई आचार संहिता भी है जो उन्हें राजनीतिक दलों की गतिविधियों में शामिल होने से रोकती भी है।  सवाल ये नहीं है कि  प्रशासनिक अधिकारी सत्तारूढ़ दल के कार्यक्रम में शामिल हुए,सवाल ये है कि  क्या ऐसा कर उन्होंने कोई नजीर पैदा की है ? सवाल ये भी है कि  लोकसेवकों के इस आचारण का आम जनता पर,और प्रशासनिक कामकाज पर भी कोई असर पडेगा या नहीं ? 

जहाँ तक मेरा ज्ञान है कि  लोक सेवा अधिनियम, 2007 (संशोधन, 2009) में जिन नैतिक मूल्यों पर बल दिया गया है, उन्हें नीति संहिता माना जा सकता है।इस नीति संहिता के मुताबिक लोकसेवक को संविधान की प्रस्तावना में आदर्शों के प्रति निष्ठा रखना।तटस्थता, निष्पक्षता बनाए रखना।

किसी राजनीतिक दल के प्रति सार्वजनिक निष्ठा न रखना। यदि किसी दल से लगाव हो तो भी अपने कार्यों पर प्रभाव न पड़ने देना।देश की सामाजिक-सांस्कृतिक विविधता के प्रति सम्मान का भाव रखते हुए वंचित समूहों (लिंग, जाति, वर्ग या अन्य कारणों से) के प्रति करुणा का भाव रखते हुए  निर्णयन प्रक्रिया में उत्तरदायित्व एवं पारदर्शिता के साथ-साथ उच्चतम सत्यनिष्ठा को बनाए रखना चाहिए। 

मेरे सम्पर्क में ऐसे बहुत से लोकसेवक रहे हैं जिनकी अपनी राजनीतिक निष्ठाएं थीं लेकिन वे कभी खुलकर किसी राजनीतिक दल के किसी कार्यक्रम में शामिल नहीं हुए। एक आईपीएस थे अयोध्यानाथ पाठक ,वे तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह के अंधभक्त थे ।  उन्होंने 1983  में महाराज बाड़ा पर एक संगठन की आमसभा में आरएसएस के खिलाफ खुलकर भाषण दिए थे। उनकी इस कार्रवाई पर विधानसभा में जमकर हंगामा हुआ था और पाठक जी को सफाई देना पड़ी थी।पाठक जी प्रदेश कि पुलिस महानिदेशक बनर सेवनिवृर्त  हुए लेकिन किसी दल में शामिल नहीं हो पाए।  एक आईएएस अफसर थे एसके मिश्रा वे बुधनी उपचुनाव के समय  भाजपा की एक चुनाव सभा में कलेक्टर की हैसियत से तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के सामने घुटनों के बल बैठे देखे गए तो उनके खिलाफ फौरन कार्रवाई की गयी। एक थीं शशि कर्णावत वे तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के आगे-पीछे घूमती ही नहीं थीं बल्कि शासकीय कार्यक्रमों में भी कांग्रेस की बात करतीं थीं,आज उनका आता-पता नहीं है। 

ग्वालियर कलेक्टर श्रीमती रुचिका सिंह और संघप्रिय भी इसी तरह राजनीतिक निष्ठाओं से बंधे लोकसेवक के रूप में चिन्हित किये गए हैं। इन दोनों के समाने विकल्प था कि  ये दोनों भाजपा के होली मिलन समारोह में शामिल होने से इंकार कर सकते थे ,लेकिन इन दोनों ने ऐसानहीं किया। क्योंकि इन्हें लगा कि  वे कुछ गलत नहीं कर रहे है।  एक तरह से ये गलत है भी नहीं।  किन्तु एक लोकसेवक के नाते इन दोनों का आचरण सवालों के घेरे में तो आता ही है।  मुमकिन है कि  इन दोनों ने सोचा हो की जब केंद्र सरकार ने शासकीय कर्मचारियों को आरएसएस के कार्यक्रमों में शामिल होने की छूट दे दी है तो फिर भाजपा के कार्यकक्रमों में शामिल होने से क्या हर्ज है ? 

मुझे लगता है कि  भाजपा की प्रदेश सरकार ग्वालियर के इन दोनों दुस्साहसी लिकसेवकों के आचरण के लिए इन्हें दण्डित करने के बजाय पुरस्कृत करेगी। इन दोनों ने पूरे प्रदेश की नौकरशाही के लिए एक नजीर पेश की है। अब मुमकिन है कि  हर जिले में आपको प्रशासनिक अफसर सत्तारूढ़ दल के कार्यक्रमों में भगवा दुपट्टा डाले नजर आने लगें। शैक्षणिक संस्थानों में तो भवकरण अब पुरानी बात हो गयी है ,केवल एक प्रशासन इससे बचा था जो इस होली पर खुद भगवा हो गया। 

वर्तमान समय में सिविल सेवकों के लिए आचार मानकों को भारतीय संविधान के अनुच्छेद-309 के तह्ठत सिविल सर्विस (कंडक्ट) रूल्स में उल्लिख़ित आचरण नियमों के आधार पर किया जाता है। इस पर एक कानून की आवश्यकता को समझकर ही भारत सरकार द्वारा सिविल सर्विस स्टैंडर्ड्स, परफॉरमेन्स एंड अकाउंटिबिलिटी बिल,2010 को लाया गया, जिसमें सिविल सेवकों को बहुआयामी ढंग से कार्यकुशल बनाने के लिए प्रावधान किए गए हैं।लेकिन अब ये तमाम प्रावधान मुझे निरर्थक होते दिखाई दे रहे हैं। मै ग्वालियर जिले  की कलेक्टर और ग्वालियर नगर निगम के आयुक्त को बधाई तो नहीं दूंगा किन्तु उनके दुस्साहस को सलाम जरूर करूंगा ।  मुझे प्रतीक्षा रहेगी प्रदेश के मुख्य सचिव अनुराग जैन के भावी व्यवहार और निर्णय की किए  वे अपने मातहतों के भगवाकरण को लेकर संज्ञान लेते हैं या इसकी अनदेखी करते हैं ? वैसे मुख्य सचिव को अभी तक तो किसी ने मैदान में विचरते देखा नहीं है। 

मेरा अनुभव है कि  तमाम लोकसेवकों के मन में एक अतृप्त कामना होती है नेतागिरी करने की ।  वे अनपढ़ नेताओं के सामने जब अपने  आपको निरीह अवस्था में पाते हैं ,तब उन्हें लगता है कि  क्या ही अच्छा होकि वे खुद राजनीती में आ जाएँ।  जो दुस्साहसी हैं वे नौकरी छोड़कर राजनीती में आ ही जाते हैं और जो संकोची हैं वे सेवानिवृत्ति का इंतजार करते हैं।  मप्र के एक पूर्व मंत्री पटवारी थे,नौकरी छोड़कर राजनीति में आये थे ।  डॉ भगीरथ प्रसाद ,सरदार सिंह डंगस   जैसे अनेक आईएएस अफसरों ने बाद में राजनीति की ही शरण ली ही और विधानसभाओं तथा संसद तक में पहुंचे। श्रीमती रुचिका सिंह और संघप्रिय ने भी सरकार के सामने अपनी रूचि का प्रदर्शन कर दिया है। अब आपको ,सबको इंतजार करना पड़ेगा इन दोनों को राजनेता के रूप में ढलते देखने का।  हमारी शुभकामनायें। 

@ राकेश अचल

सोमवार, 17 मार्च 2025

देश की राजधानी दिल्ली में ज्योतिष महाकुंभ में ग्वालियर से डॉ हुकुमचंद जैन शामिल होंगे

अखिल भारतीय जैन ज्योतिषाचार्य परिषद के द्वारा राष्ट्रीय अधिवेशन 18 मार्च 19 मार्च को ग्रीनपार्क दिल्ली में बालयोगी आचार्य सौभाग्य सागर जी महाराज के परम सानिध्य में  आयोजित किया जाएगा।

 इस आयोजन में ज्योतिष विषय पर और उसकी उपयोगिता के बढ़ते चरण आधुनिक जीवन शैली के लिए कितने कारगर है इस विषय  पर चिंतन, मंथन होगा। इस अष्टम ज्योतिष महाकुंभ में दिल्ली क्षेत्र के अलावा उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र ,हरियाणा सहित देश के अनेक प्रांतो से चुने हुए जाने-माने विद्वान ही भाग लेंगे।

ग्वालियर चंबल संभाग से और मध्य प्रदेश से एकमात्र ज्योतिषाचार्य डॉ हुकुमचंद जैन भी इस ज्योतिष महाकुंभ में भाग लेंगे और आधुनिक जीवन शैली पर ज्योतिष का प्रभाव और उसकी उपयोगिता सिद्ध करते हुए अपने विचार रखेंगे 19 मार्च को कुंद  कुंद कुंड भारतीय में आचार्य श्री श्रुत सागर जी महाराज जी  के सानिध्य में भी यह आयोजन होगा इसमें आम श्रद्धालु की जिज्ञासाओं का खुले मंच से  ज्योतिष विद्वान समाधान करेंगे।

जो विद्वान ज्योतिष विषय में अग्रणी भूमिका रखते हैं उनका विशेष सम्मान भी होगा।

स्मृति शेष : मनीष शंकर भारतीय मनीषा से अभिभूत थे

भारतीय पुलिस सेवा के बहुचर्चित   अधिकारी मनीष शांकर शर्मा के निधन की खबर आज सुबह जब साथी प्रवीण खारीवाल ने दी तो यकायक भरोसा नहीं हुआ ,लेकिन जब अन्यान्य सूत्रों से इस खबर की पुष्टि हो गयी तो दिल बैठ गया। मनीष को इतनी जल्दी जाना नहीं चाहिए था। वे पुलिस में रहते हुए भी भारतीय मनीषा के अघोषित प्रतिनिधि थे।

कोई तीन दशक पुरानी बात है ।  मनीष ग्वालियर में हमारे पड़ौस में रहने आये थे ।  उन्हें ग्वालियर के थाटीपुर में हमारे घर के पीछे ही एक एफ टाइप बँगला आवंटित हुआ था ।  मिश्र डबरा में एसडीओ रह चुके थे और पदोन्नत होकर एडिशनल एसपी के रूप में ग्वालियर आये थे।  अविवाहित थे, दिलखुश थे और मुझे सदैव भाई साहब कहकर सम्बोधित किया करते थे। मै अक्सर मनीष से कहा करता था कि- आप गलत नौकरी में आ गए हैं। आपका व्यक्तित्व पुलिस के चाल,चात्रित्र और चेहरे से मेल नहीं खाता। वे हंसकर टाल जाते और कभी-कभी कहते पुलिस के इसी चेहरे को तो बदलना है भाई साहब !

मनीष के पिता  श्री केएस शर्मा मध्यप्रदेश के मुख्य सचिव रहे। लेकिन उन्हें इसका कोई दम्भ न था।  वे बेहद सहज और मितभाषी थे। मनीष के विवाह में मै ग्वालियर से भोपाल गया था। तत्कालीन पुलिस महानिदेशक अयोध्या नाथ पाठक और मनीष के पिता जी की जोड़ी का जलवा था ।  पाठक जी मेरे पुराने मित्र थे ।  उनके साथ ही हम  पुलिस के मेहमान थे ।  लौटते में हमने मनीष की शादी के उपलक्ष्य में चांदी का एक सिक्का मिला था जो आज भी हमारे संग्रह  में है और मनीष की हमेशा याद दिलाता रहता है ।  आज भी जब मनीष के जाने की दुखद खबर पढ़ी तो वो सिक्का हमारे हाथ में था।

मनीष में असाधारण प्रतिभा थी ।  मनीष शंकर शर्मा को एक उम्दा रणनीतिकार माना जाता था । अपने तीन दशक  की नौकरी में वे प्रदेश में कम विदेश में ज्यादा सक्रिय रहे। मनीष ने दुनिया के चार महाद्वीपों में सेवाएं दीं ।वे वैश्विक आतंकवाद के विरुद्ध सक्रिय  बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी  मनीष शंकर शर्मा को अनेक  राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित किया गया । मनीष ने कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी से इंटरनेशनल सिक्युरिटी, काउंटर टेरेरिज्म एंड पब्लिक पॉलिसी में मास्टर्स डिग्री हासिल की थी । मुझसे उम्र में कोई आठ साल छोटे  मनीष शंकर शर्मा ने इंदौर के डेली कॉलेज से स्कूलिंग और भोपाल स्कूल ऑफ सोशल साइंसेज से ग्रेजुएशन किया  था । मनीष ने बिड़ला इंस्टीट्यूट, पिलानी से मार्केटिंग में एमबीए भी किया। 1992 बैच में उनका आईपीएस में चयन हुआ।

मनीष वर्ष 1997 में करीब एक साल के लिए उन्हें संयुक्त राष्ट्र मिशन के तहत बोस्निया और हर्जेगोविना में प्रतिनियुक्ति पर चले  गये।  उन्होंने  संयुक्त राष्ट्र मिशन से लौटने के पश्चात वे रायसेन, सतना, छिंदवाड़ा और खंडवा आदि जिलों में एसपी रहे। इस दौरान मनीष   ने अपनी जवाबदेह कार्यशैली, दूरदर्शिता, क्राइम कंट्रोल, लॉ एंड ऑर्डर में सुधार और व्यवहार कुशलता से अलग  पहचान कायम की, खासकर कमजोर तबके को न्याय दिलाने की इनकी प्रतिबद्धता जग-जाहिर थी।  फरवरी 2005 में मनीष शंकर शर्मा केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर दिल्ली आ गए, जहां मिनिस्ट्री ऑफ सिविल एविएशन के अंतर्गत उन्हें करीब तीन वर्षों के लिए एयरपोर्ट अथॉरिटी का सिक्योरिटी डायरेक्टर बनाया गया। यहां देशभर के 114 एयरपोर्ट की सुरक्षा की जिम्मेदारी इनके ऊपर थी।अगस्त 2008 में भारत सरकार के वित्त मंत्रालय ने उन्हें टी बोर्ड इंडिया के लिये वेस्ट एशिया एंड नॉर्थ अफ्रीका का डायरेक्टर बनाया गया। अपने करीब तीन साल की पोस्टिंग के दौरान इन्होंने टी बोर्ड के वैश्विक व्यापार को बढ़ाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। सितंबर 2011 में मनीष मध्यप्रदेश कैडर लौट आये।

मुझे याद  आता है कि  मनीष ने  आईजी, भोपाल के तौर पर  पुलिस सर्विस रिफॉर्म पर जोर दिया और पुलिस सर्विस में समय से प्रमोशन, पुलिसकर्मियों की समस्या के समाधान और पुलिसकर्मियों को सुविधा पर विशेष ध्यान दिया। जिससे वे जनता के साथ पुलिसकर्मियों में भी लोकप्रिय हुए।‌ मई 2017 में उनकी पदोन्नति एडीजीपी के पद कर हुई।  मनीष शंकर शर्मा ने आईएसआईएस की स्थापना, उसके मकसद, कार्यप्रणाली, वित्तीय संसाधनों पर वृहद अध्ययन किया, साथ ही इसपर काबू पाने के लिए एक वैश्विक रणनीति का तरीका भी बनाया। मनीष एक बेहतरीन वक्ता और लेखक भी हैं। विश्व भर में आतंकवाद प्रबंधन आदि विषयों पर उन्होंने उम्द संबोधन किया है। वैश्विक आतंकवाद की प्रसिद्ध पुस्तक ‘ग्लोबल टेररिज्म-चैलेंजेस एंड पॉलिसी ऑप्शंस’ में योगदान देने वाले वे एकमात्र भारतीय लेखक हैं।

 मनीष शंकर शर्मा को कई अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय सम्मान, पदक और पुरस्कार मिले । वे यूनाइटेड नेशंस पीस मेडल, नेशनल लॉ डे अवॉर्ड, ईज ऑफ डूइंग बिजनेस अवॉर्ड, भारत के दस चुनिंदा आईपीएस अधिकारियों को मिलने वाला रोल ऑफ ऑनर और पद्मश्री "आरएन जुत्शी मेडल" से सम्मानित हुए । वर्ष 2015 में सैन डिएगो की सिटी काउंसिल ने मनीष शंकर शर्मा का विशेष रूप से अभिनंदन कर और 20 जुलाई का दिन शहर में 'मनीष शंकर शर्मा डे'  के तौर पर मनाया गया ,उन दिनों मै खुद अमेरिका में था ,मैंने अटलांटा से उन्हें बधाई दी थी। । इन्हें अमेरिकी संसद के 'हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव' ने भी सम्मानित किया है।

इतनी उपलब्धियों के बावजूद मनीष का मन स्थिर नहीं हो पाया। पिछले कुछ वर्षों से मनीष कुछ उखड़े-उखड़े से नजर आने लगे थे। पता नहीं कौन सा कौना था जो उन्हें उदासीनता की और धकेल रहा था। हाल ही में मनीष को एडीजे रेल के पद पर पदस्थ किया गया था। एक लम्बे समय बाअद उन्हें कोई जिम्मेदारी सौंपी गयी थी। एडीजी रेल बनने के बाद भी उनके जीवन की रेल बेपटरी  ही बनी रही। वे मानसिक अवसाद से बाहर नहीं आये।  उनका खूब इलाज भी कराया गया ,लेकिन बीती रात उन्होंने इस फानी दुनिया को अलविदा कह दिया।  मेरे प्रिय पुलिस अधिकारीयों में से मनीष दूसरे ऐसे पुलिस अधिकारी रहे हैं जो असमय चले गए ।  इससे पहले मेरे एक और पड़ौसी मोहम्मद अफजल भी इसी तरह असाध्य बीमारी की वजह से कालकवलित हो गए थे। मनीष के परिजनों के प्रति मेरी हार्दिक संवेदनाएं और मनीष के प्रति विनम्र श्रृद्धांजलि।

@ राकेश अचल

आखिर क्यों पिटती है पुलिस हर सूबे में ?

 

एक छोटा सा सवाल है  कि आखिर देश  के हर हिस्से में पुलिस क्यों पिटती है ? क्या देश में जनता को खाकी वर्दी से अब डर नहीं लगता जबकि पुलिस की वर्दी का दूसरा नाम ही खौफ है। मध्यप्रदेश के मऊगंज से लेकर भागलपुर तक  और भागलपुर से लेकर जहानाबाद तक पुलिस को पिटते देख ये सोचने पर विवश होना पड़ रहा है कि  हिंदुस्तान में आखिर क्या वजह है जो  पुलिस का इकबाल मिटटी में मिल गया है ?

सबसे पहले मध्यप्रदेश के मऊगंज की बात करते हैं। मऊगंज में न कोई अबू आजमी है और न किसी औरंगजेब की कब्र ,लेकिन यहां जो बवाल हुआ उसमें एक पुलिस कर्मी की मौत हो गयी और अनेक घायल हो गए। मध्य प्रदेश के मऊगंज जिले के  गड़रा गांव में दो गुटों के बीच झगड़े की कीमत पुलिस को चुकानी पड़ी। पुलिसकर्मियों के झड़प ने ऐसा स्वरूप लिया कि एक एएसआई रामचरण गौतम की जान चली गई। वहीं तहसीलदार समेत कई पुलिसकर्मी गंभीर रूप से घायल हुए हैं।यहां न कोई हिन्दू था और न कोई मुसलमान। पक्षकार आदिवासी थे ,लेकिन वे पुलिस पर भारी पड़े।  मुख्यमंत्री डॉक्टर मोहन यादव ने इस घटना की जांच के आदेश दिए हैं।

मध्यप्रदेश में पुलिस कमिश्नर प्रणाली लागू हुए चार साल हो गए हैं ,हालाँकि पुलिस कमीश्नर प्रणाली केवल भोपाल और इंदौर शहर में लागू है लेकिन प्रदेश में पुलिस का इक़बाल बुलंद नहीं हो पाया। कारण ये है कि  प्रदेश की पुलिस भ्र्ष्ट होने के साथ ही साम्प्रदायिक और नेताओं की कठपुतली बन गयी है। पुलिस में सिपाही से लेकर पुलिस अधीक्षक तक की पदस्थापना में सियासत का दखल है और नतीजा ये है  कि  लोग अब पुलिस की वर्दी का न सम्मान करते हैं और न पुलिस से खौफ कहते हैं। 

अब बात बिहार की कर लेते है।  यहां तो पुलिस न सिर्फ पिटती है बल्कि नेताओं के इशारे पर नाचने के लिए भी मजबूर  की जाती है ,और आखिर में महकमें की प्रताड़ना का शिकार भी पुलिस वाले ही होते हैं। लालू प्रसाद के बेटे तेजप्रताप के इशारे पार होली के दिन नाचने वाले एक सिपाही को आखिर निलंबित कर दिया गया। बिहार में बेखौफ बदमाश पुलिस पर हमला करने से भी बाज नहीं आ रहे। तीन दिनों पहले अररिया जिला के फुलकाहा थाना में तैनात एएसआई (जमादार) राजीव रंजन मल्ल की धक्का-मुक्की में मौत के बाद फिर मुंगेर में मुफस्सिल थाना के एएसआई संतोष कुमार सिंह की धारदार हथियार से हत्या कर दी गई।वे 14 मार्च की रात आपसी विवाद की सूचना पर उसे सुलझाने नंदलालपुर गांव गए थे। जहां बदमाशों ने उन पर हमला कर दिया। इसमें एएसआई संतोष गंभीर रूप से घायल हो गए थे, उनके सिर पर चोट लगी थी।

पंजाब में तो हालत और भी ज्यादा खराब हैं।  सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी की राज्यसभा सांसद स्वाति मालीवाल ने कहा कि पूरा पुलिस महकमा केजरीवाल की सेवा में लगा हुआ है। पंजाब में कानून व्यवस्था बेहद खराब है।पुलिस के साथ जो व्यवहार मध्यप्रदेश के मऊगंज में हुआ वैसा ही व्यवहार उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले में भी हुआ।  जिले के अजगैन कोतवाली के छेड़ा गांव में 14 मार्च को शराब के नशे में दो भाइयों में विवाद के बाद पथराव हुआ था। पहले आरोपियों के पिता रामस्वरूप की हृदयगति रुकने से मौत हो गई थी। वहीं, पड़ोसी धीरेंद्र की नाक में पत्थर लगने से उसकी मौत हो गई थी। पुलिस आरोपी भाइयों को हिरासत में लेकर जा रही थी तभी कुछ ग्रामीणों ने रास्ता रोक लिया और दोनों आरोपियों को जीप से खींचने का प्रयास किया था।

भारत में पुलिस व्यवस्था बहुत पुरानी है। मुगलों और अंग्रेजों से भी पुरानी।  लेकिन मुगलों और अंग्रेजों ने पुलिस व्यवस्था को और मजबूत किया और इसका इकबाल भी बुलंद किया। कोटवार से लेकर कोतवाल तक और आज सिपाही से लेकर   महानिदेशक तक का इकबाल होता है ,किन्तु आजादी के बाद देशभक्ति -जन सेवा का ध्येय  लेकर बनाई गयी पुलिस या तो जुल्म का पर्याय बन गयी या फिर कालांतर में सत्ता प्रतिष्ठान की कठपुतली। पुलिस बल में समय के साथ सुधार भी हुए लेकिन पुलिस आज भी जनता की जरूरतों से ज्यादा सत्ता प्रतिष्ठान की जरूरतों का ख्याल रखती है।  जनता के मन में पुलिस के लिए कोई आदरभाव नहीं है क्योंकि पुलिस अपराधियों,नेताओं और सत्ता रपतिष्ठं के गठजोड़ का एक हिस्सा बनकर रह गयी है। 

आपको बता दूँ कि  संविधान के तहत, पुलिस राज्यों द्वारा शासित एक विषय है। इसलिए, 29 राज्यों में से प्रत्येक के पास अपने स्वयं के पुलिस बल हैं। केंद्र को कानून और व्यवस्था सुनिश्चित करने में राज्यों की सहायता के लिए अपने स्वयं के पुलिस बलों को बनाए रखने की भी अनुमति है। केवल केंद्र शासित क्षेत्रों में पुलिस केंद्र के अधीन होती है ,पुलिस के आधुनिकीकरण पर बेहिसाब खर्च के बावजूद न पुलिस की मानसिकता बदली और न व्यवहार ।  आज भी आम आदमी  पुलिस से डरता है।   आम इंसान यही समझता है कि  पुलिस मतलब समस्या को आमंत्रण देना है। पुलिस के प्रति समाज में घृणा है /पुलिस न खुद क़ानून का पालन करती है और न क़ानून का पालन करा पाती है। 

मैंने दुनिया के अनेक देशों में पुलिसिंग देखी है ।  कहीं भारत की पुलिस कुछ आगे है तो कहीं बहुत पीछे ।  हमारी पुलिस न इंग्लैण्ड की पुलिस बन पायी और न अमेरिका की पुलिस। भारत की पुलिस में राजनीति का दखल इतना बढ़ गया है कि  पुलिस अपने विवेक से कोई काम कर ही नहीं सकती। पुलिस नेताओं के हुक्म की गुलाम बनकर रह गयी है और इसका नतीजा है कि  पुलिस पर पूरे देश में हमले हो रहे हैं ,पुलिस कर्मी मारे जा रहे हैं ,लेकिन कोई इसकी जड़ तक नहीं जाना चाहता। सब क्रिया की प्रतिक्रिया तक ही सीमित हैं। पुलिस का इकबाल बुलंद किये बिना पुलिस कर्मियों पर होने वाले हमले रुकने वाले नहीं हैं। पुलिस का व्यवहार बदलना बेहद जरूरी है। 

इस समय दुनिया की सबसे ज्यादा आबादी वाले देश भारत में करीब 21.41 लाख पुलिसकर्मी हैं, लेकिन कुल पुलिस फोर्स में महिलाओं का औसत महज 12 प्रतिशत से कुछ ही ज्यादा है। भारत में औसत करीब 646 लोगों पर एक पुलिसकर्मी का बैठता है. हालांकि, इसमें राज्यों के विशेष सशस्त्र पुलिस बल और रिजर्व बटालियन के पुलिसकर्मियों की संख्या भी  शामिल है।  कुछ राज्यों में पुलिस के पास अपना वाहन या स्पीडगन नहीं है तो कुछ पुलिस स्टेशनों में वायरलेस या मोबाइल फोन तक नहीं है। 

पुलिस अनुसन्धान एवं विकास ब्यूरो के आंकड़ें बताते हैं कि  राज्यों में मिलाकर 27.23 लाख पदों में से कुल 5.82 लाख से ज्यादा पुलिसकर्मियों के पद खाली हैं।  इनमें सबसे ज्यादा सिविल पुलिस के 18.34 लाख में से 4 लाख पद खाली हैं।  सिविल पुलिस ही थाना क्षेत्रों में गश्त करने, मौका-ए-वारदात पर पहुंचने, किसी केस की छानबीन करने और कानून-व्यवस्था संभालने का का काम करती है।  इसके अलावा, देश में जिला सशस्त्र रिजर्व पुलिस बल के 3.26 लाख पदों में करीब 87 हजार पद खाली हैं. वहीं, राज्य विशेष सशस्त्र बल के 3.95.लाख पदों में से 63 हजार और रिजर्व बटालियन के 1.69 लाख पदों में से 28.5 हजार पद भरे नहीं जा सके। सरकारों का बस चले तो वो पुलिस में भी संविदा पर भर्तियां कर दे। 

@ राकेश अचल

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